मैं एक परिंदा हूँ
श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
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मैं एक परिंदा हूँ
इस जहां से ही शर्मिंदा हूँ,
उड़ने को सारा
आसमां है खाली
पर कतर डाले मेरे
फिर भी मैं जिंदा हूँ
मैं एक परिंदा हूँ...
हम परिंदे ऊंची उड़ान
की ताक में हैं
पर तीर आज हर
मनुष की कमान में है
सोचता था सब
ठीक होगा एक दिन,
पर मेरा भ्रम भ्रम ही रहा
क्युकी मैं एक
परिंदा ही तो हूँ....!
मैं आजाद
बेफिक्र सा पंछी,
तुमने कैद कर
चुरा डाली सांसे मेरी
दिल पर मेरे क्या गुजरी
ये तुम क्या समझो हे मानव
कभी तूफ़ाँ ने उड़ा डाला
घरौंदा मेरा,
कभी टहनियों पर बसा
उजाड़ डाला तुमने
अभिलाषा उस नन्हें
परिंदे सी तो थी,
जो विशाल गगन में
पखं फैलाने का
दम भरता है
क्योंकि मैं एक परिंदा हूँ...!
लौट आता हूँ बार-बार
उसी कूचे पर,
रंग नया है पर
मकां वही पुराना है,
ये घर मेरा जाना
पहचाना सा है,
...




















