समर्पण
डॉ. अर्चना मिश्रा
दिल्ली
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थी कोमलांगी बन कर
आइ प्रेम की अभिमूरत
सींचा पूरे घर को
बड़े प्रेम से मेने
हृदयपटल पर वास तुम्हारा
अब क्या मांगू रब से
छूटा मायका, छूटे सपने
तेरे साथ चले जब
छोड़ कर हम अपने
पग पग प्रीत निभाऊँ में
प्रेम की अविरल
धार बहाऊँ में
निस्वार्थ भाव से साथ निभाऊ
करूँ ना कामना कुछ भी
संग में तेरे खुश हो जाऊँ
संग में तेरे दुःख मनाऊँ
भूल गई अपने को में तो
जबसे तेरे रंग में रंगी पिया
कदम कदम पर दी क़ुर्बानी
बात तेरी हरदम मानी
कितनो को नाराज़ किया
साथ तेरा जब से किया
निश्छल हे प्रेम मेरा
आगे ही बढ़ती जाऊँगी
प्रेम की अमृत वर्षा से
घर अपना
स्वर्ग बनाऊँगी
पग-पग राह में तेरे
पुष्प बिछाऊँ में
काँटों से कँटीली भरे
जहान में धंसती जाऊँ में
भूल गई सपने अपने
भूल गई खुद को ही में
तुझको अपने में ही
एकाकार किया
प्रेम में बाती बन कर
म...






















