आगे बढ़ता चढ़ता सूरज
डॉ. प्रीति प्रवीण खरे
भोपाल (मध्य प्रदेश)
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आगे बढ़ता चढ़ता सूरज,
नभ पर चलता गाता सूरज।
आगे बढ़ता चढ़ता सूरज।।
ख़ुशियों के तुम दीप जलाओ,
बाग़ों-बाग़ों फूल खिलाओ।
मन में हो जब घोर निराशा,
आशाओं का उगता सूरज।
आगे बढ़ता चढ़ता सूरज।।
बरगद पीपल छाँव लुटाए,
नदिया अपना राग सुनाए।
हँसते-हँसते जंगल बोला,
गीत सुनानें आता सूरज।
आगे बढ़ता चढ़ता सूरज।।
जब शाम ढले घर आँगन में,
तब जुगनू निकले सावन में।
बदली पे जब मस्ती छाई,
आँख मिचौली करता सूरज।
आगे बढ़ता चढ़ता सूरज।।
नभ पर चलता गाता सूरज।
आगे बढ़ता चढ़ता सूरज।।
परिचय :- डॉ. प्रीति प्रवीण खरे
निवासी : कोटरा सुल्तानाबाद रोड भोपाल (मध्य प्रदेश)
लेखन विधाएँ : गीत, ग़ज़ल, कविता, कहानी, लघुकथा, नाटक एवं बाल साहित्य।
प्रकाशन : राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का ...























