कभी तुम चुप रहो
मंजू लोढ़ा
परेल मुंबई (महाराष्ट्र)
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कभी तुम चुप रहो,
कभी मैं चुप रहूँ,
कभी हम चुप रहें
खामोशियों को
करने दो बातें,
यह खामोशियाँ भी
बहुत कुछ कह जाती हैं,
जो हम कह न सकें
वह भी कह जाती हैं।
कभी तुम ...
आओ आज युंही बैठे
एक-दुजे की
आंखो में डुबे
उस प्यार को
महसुस करे
जो जुंबा पर कभी
आया ही नहीं।
कभी तुम चुप ...
आओ हम तुम
नदी किनारे
हाथों में हाथ दे
चहलकदमी करें
मुद्दतों से जो
सोया था एहसास
उसे तपिश की
गर्माहट को महसुस करें।
कभी तुम चुप ...
आओ आज छेडे,
ऐसा कोई तराना
जो धडकनों में बस जाये
बिन गाये, बिन गुनगुनाये
संगीत की लहरियों में
हम डुब जाये।
कभी तुम चुप ...
चुप रहना कोई सजा नहीं
चुप रहना एक कला है,
जो बिना कहें
सब कुछ कह जायें
वह प्यार तो पूजा है।
कभी तुम चुप रहो
कभी मैं चुप रहूँ
कभी हम चुप रहें....।
परिचय :- मंजू लोढ़ा...
























