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सुन ले पुकार

रुचिता नीमा
इंदौर (मध्य प्रदेश)
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हे ईश्वर कहाँ है तू,
कहते है कण कण में बसा तू,
हर जीव के मन में बसा तू,
फिर क्यों नहीं तुझको दिखता,
इस जग में कितना आतंक मचा।।

चारों और है विध्वंस मचा,
मृत्यु का तांडव है रचा,
मानवता को ताक में रख,
लूटमारी का सब खेल रचा,
जो कहलाते है जीवन रक्षक,
अब धन के लिये बन रहे भक्षक।।

क्या राजनेता सिर्फ अपनी रोटी सकेंगे,
निर्धन फिर मृत्यु की बलि चढ़ेगे,
कही भूख से, तो कही दुख से,
तो कही बेरोजगारी की मार सहेंगे।।

हे ईश्वर अब तो कुछ राह दिखा,
इस काल को अपना ग्रास बना।।
ले अवतार अब ओ तारण हार,
इस महामारी से मुक्त करा।।

अब बहुत हुआ इसका आतंक
तू आकर इसको खत्म कर।।
कितने अपनों को लील गया,
जग में अनाथ कर छोड़ गया।।

अब तू और न विलम्ब कर,
सुन ले पुकार, और मदद कर।।
जग में फिर से खुशहाली कर।
आकर बन्द ये तबाही कर।।

एक बार फिर नई शुरुआत कर,
जो बन्द है इबादतों की इमारतें,
उन्हें फिर से गुलज़ार कर,
रुकी हुई है जो ये जिंदगी,
आकर इसको बहाल कर।।

परिचय :-  रुचिता नीमा जन्म २ जुलाई १९८२ आप एक कुशल ग्रहणी हैं, कविता लेखन व सोशल वर्क में आपकी गहरी रूचि है आपने जूलॉजी में एम.एस.सी., मइक्रोबॉयोलॉजी में बी.एस.सी. व इग्नू से बी.एड. किया है आप इंदौर निवासी हैं।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।


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