देखी नहीं जातीं
डॉ. कामता नाथ सिंह
बेवल, रायबरेली
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दिमाग़ी तौर की बीमारियाँ
देखी नहीं जातीं।
तेरी गुस्ताखियाँ, ऐयारियाँ
देखी नहीं जातीं।।
बहुत दुशवार है हालात से
लड़ना, बदल पाना,
निजामत की मगर गद्दारियाँ
देखी नहीं जातीं।।
यहाँ बरफीली सर्दी में पडे़ हैं
आसमां ओढे़,
तेरा रंगीन बिस्तर, गरमियाँ
देखी नहीं जातीं।।
जहाँ सरसब्ज़ दोआबा था,
है अंगार आँखों में,
ये सहरां और ये वीरानियाँ
देखी नहीं जातीं।।
तेरी वहशत से हम दहशत में
आये हैं, न आयेंगे,
कुचलने की हमें तैयारियाँ
देखी नहीं जातीं।।
खुदा के वास्ते परदा उठा दे
अपनी आँखों से,
ऐ जालिम अब तेरी मक्कारियाँ
देखी नहीं जातीं।।
परिचय :- डॉ. कामता नाथ सिंह
पिता : स्व. दुर्गा बख़्श सिंह
निवासी : बेवल, रायबरेली
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।
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