मिलन की प्यास है
मनोरमा जोशी
इंदौर (मध्य प्रदेश)
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मैं सौ-सौ बार निहारूँ,
फिर भी बढ़ती प्यास है।
मेरे और तुम्हारे मन का,
प्रियतम जाने
क्या इतिहास है।
मेघों ने अपनी प्यास
बुझाई सागर से,
धरती की बुझी प्यास
व्योम के जलधर से।
धरती से लेकर नीर
चली सब सरिताएं,
जाकर के प्यास
बुझाई क्रम सत्वर से,
मेरी आँखें
युगों-युगों से प्यासी पर,
अभी अधूरी आस है।
मेरे और तुम्हारे मन का
जाने क्या इतिहास है।
मन का आशामृग
ढू़ढ़ रहा कस्तूरी है,
लक्ष्य पास है,
फिर भी बहुत ही दूरी है।
जाने कितनी गंध
रूप की मुझे लुभाती,
तुम बिन कुछ ना
भाता मजबूरी है,
मेरे मन चाहा सौरभ का तो,
मेरे अन्तर ही में वास है,
मेरे और तुम्हारे मन का,
यह जाने क्या इतिहास है।
मिलन की प्यास है।
परिचय :- श्रीमती मनोरमा जोशी का निवास मध्यप्रदेश के इंदौर में है। आपका साहित्यिक उपनाम ‘मनु’ है। आपकी जन्मतिथि १९ दिसम्बर १९५३ और जन्मस्थान नरसिंहगढ़ है। ...























