इंतजार
सुरेखा सुनील दत्त शर्मा
बेगम बाग (मेरठ)
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मेरे इश्क के समंदर को फिर बेचैन कर गया कोई,
ठहरे हुए जज्बात में फिर हलचल कर गया कोई,
पत्थर मारा था उठाकर फिर किसी ने समंदर में,
मेरे इश्क के शांत समंदर में फिर हिलोरे दे गया कोई।
मौत को आकर देखो इस हद तक जी गया कोई,
कि जीने से पहले अपने आप को हरसू कर गया कोई,
उदास आंखों में फिर समंदर का सैलाब उमड़ा है ,
मौत से पहले ही लहरों सा आकर समंदर में पैगाम दे गया कोई।
आज आंखों को बेइंतहा इंतजार दे गया कोई,
आंखों से अश्कों को इस कदर बहता छोड़ गया कोई,
क्या समझाऊं दिल को उसके इंतजार की वजह,
दिल में उठते तूफान में फिर कसक जगा गया कोई।
वक्त के पिंजरे को खोल कर सांसो का परिंदा उड़ा गया कोई,
दिल में उठते तूफान को हर पल थाम गया कोई,
सिमट जाती है एक-एक करके ख्वाहिशें सारी दिल में,
जिंदगी की कशमकश से दूर श्मशान में इंतजार कर रहा है कोई।
दर्द बढ़...
























