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संवाद

हंसराज गुप्ता
जयपुर (राजस्थान)

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सोचिये एक माँ जिसकी असमय ही अंतिम विदाई थी शरीर शिथिल हो चला था उसने एक बार आँखें खोली पति और छोटे छोटे बच्चों की तरफ देखा उस पल संकेतों में जो संवाद हुआ प्रस्तुत है:-

एक माँ की असमय विदाई
नयनन पीडा, फिर भी मुस्काई
गालों बालों पर पति के हाथ
निःशब्द संवाद फिर छूटा साथ

तब तुमसे संवाद हुआ था,
इस घर को कौन चलायेगा.
आगे निशा अंधकार है,
ऊषा बन कौन जगायेगा.

सूरज किरण, आभा से चंदा,
तारा टिमटिम से भाता है.
बाती से ज्योति दीपक की,
तम हरता चमक जगाता है.

तुमने धीरे से कहा, भ्रमर!
इस भ्रम में समर न खो देना.
मीठा जल है, उपजाऊ मिट्टी,
श्रेष्ठ पौध हैं, बस बो देना.

मैं शक्तिरूप में साथ रहूँगी,
जब विषाद उन्माद करोगे.
संवाद का वचन दिया प्रियतम,
जब तुम मुझको याद करोगे.

तुलसी कालीदास प्रसाद की,
तुम ही तो कथा सुनाते थे.
‘बीत गयी सो बात गई’,
बच्चन की कविता गाते थे.

सृष्टि दृष्टि ऊर्जा उजियाली,
किरण लाली हैं, सब मतवाली.
वृक्ष-वल्लरियां, फल फूल कलियाँ,
विहंग सब होंगे, बन जाओ माली.

यह आस नई, संकल्प नया.
भ्रमर का नया समर होगा.
पथ में भटकाव न आने दें,
तव अंश से वंश अमर होगा.

परिचय :-  हंसराज गुप्ता, लेखाधिकारी, जयपुर
निवासी : अजीतगढ़ (सीकर ) राजस्थान


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