धरा
सरला मेहता
इंदौर (मध्य प्रदेश)
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विधा.... क्षणिकाएँ
माँ धरा ही सब है धारती
उतारें तेरी हम माँ आरती
ये ताज बने ऊँचे शिखर
श्रृंखलाएँ तेरी है करधूनी
रुनझुन पैंजनी हैं घाटियाँ
मंद सुगन्धित मलय पवन
ये कलकल करती नदियाँ
रेशमी केशों की हैं लड़ियाँ
ये झरने मोती की वेणियाँ
घाटों में समाई हैं चोटियाँ
मचलती सागर की लहरें
पखारती चरणों को तेरे
हरे भरे वन उपवन ये सारे
धानी चूनर माँ को ओढ़ाए
महकते फूलों की लताएँ ये
लहँगा चोली खूब पहनाए
सूरज लाल बिंदिया लगाए
चंदा कर्णफूल बन जाता है
सितारे माँग में जड़ जाते हैं
परिचय : सरला मेहता
निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।
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