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पद्य

स्त्री हूं मैं
कविता

स्त्री हूं मैं

रश्मि नेगी पौड़ी (उत्तराखंड) ******************** स्त्री हूं मैं मुझे लाचार मत समझना शक्ति का स्वरुप, मां दुर्गा का रूप हूं मैं… ममता की मूरत, स्नेह का सागर हूं मैं दो घरों की लाज हूं मैं, दो घरों की शान हूं मैं त्याग, दया, करुणा की मूरत हूं मैं गंगा जैसी तरल और स्वच्छ हूं मैं स्त्री हूं मैं, मुझे लाचार मत समझना शक्ति का स्वरुप, मां दुर्गा का रूप हूं मैं… शास्त्रार्थ जो करते, तो मैं गार्गी बन जाती आंच जब मेरे पति पर आती, तो मैं सावित्री बन जाती अस्तित्व जब मेरे खतरे में होता, तो मैं काली बन जाती जुल्म जो तुम मुझ पर करोगे उठूंगी, लडूंगी और आगे बढूंगी अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं करूंगी हिम्मत को अपना साथी बना कर, अपनी हर मंजिल फतेह कर जाऊंगी और उतारो मुझे किसी भी क्षेत्र में तो मैं नाम कमा जाऊंगी अपनी एक अलग पहचान छोड़ जाऊंगी स्त्री हूं मैं, मुझे लाचार मत समझना शक्ति का स्वरूप मां दुर्ग...
नेहिया के डोर
गीत

नेहिया के डोर

संजय सिंह मुरलीछपरा, बलिया (उत्तर प्रदेश) ******************** https://youtu.be/NeoGdglV-wY जोरीदना नेहिया के डोर मोर सजनवा, जोरीदना नेहिया के डोर २ जन्म जन्म के प्यासल मनवा २ भटकत जाला जाने कवना ओर २ जोरीदना नेहिया के डोर ! आस के दियवा कईसे जराई २ सगरो अंधार भइल घनघोर २ जोरीदना नेहिया के डोर ! संजय जियरा तोहसे लागल २ चंदा के जाइसे निहारे चकोर २ जोरीदना नेहिया के डोर ! जोरीदना नेहिया के डोर मोर सजनवा, जोरीदना नेहिया के डोर २ परिचय :- संजय सिंह पिता : स्व. लाल साहब सिंह निवासी : ग्राम माधो सिंह नगर मुरलीछपरा जिला बलिया उत्तर प्रदेश सम्प्रति : प्रधानाध्यापक कम्पोजिट विद्यालय रामनगर घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। https://youtu.be/4NSBGzwFVpg आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिच...
ज्ञान वही… जो जागृत कर दे
कविता

ज्ञान वही… जो जागृत कर दे

ममता श्रवण अग्रवाल (अपराजिता) धवारी सतना (मध्य प्रदेश) ******************** क्या होगा गीता पढ़ पढ़ कर, जब मन में न आये कोई ज्ञान। कितना भी पढ़ पण्डित हो जाये, पर, व्यर्थ रहे, जब हो अभिमान।। ज्ञान बहे धरती पर ऐसे, ज्यों हो बादल की बरसात। पर, व्यर्थ बहें ये बूंदे कीमती, बंजर धरती न समझे औकात।। इसी तरह इस मानव मन पर, कभी न पड़ता कोई प्रभाव। चाहे जितने भी ग्रंथ वो पढले, पर मन से न जाये दुर्भाव।। प्रतिदिन होती धर्म सभायें, होता भगवत, गीता का ज्ञान। कितने जाते गुरुद्वारे, चर्च, कितने पढ़ते बैठ कुरान।। पर कभी समझ न पाते ये, अपने ईश्वर का धर्म आदेश। क्या यही सिखाया प्रभु ने हमें, क्या यही दिया था उनने उपदेश।। ईश्वर तत्व है भाव कल्याण का, जो सबका चाहें सदा कल्याण। तो, चाहो तुम यदि प्रभु को पाना, तब समझो फिर तुम उनका ज्ञान। तब समझो फिर तुम उनका ज्ञान। तब समझो फिर तुम उनका ज्ञान।। परिचय :- ममता...
आगरम… सागरम…
कविता

आगरम… सागरम…

ओंकार नाथ सिंह गोशंदेपुर (गाजीपुर) ******************** आगरम सागरम बुद्धि के नागरम कर कृपा मुझ पर कर दे मुझे निर्भयम हर समय लीन तुझ में सदा मैं रहूं अपनी विपदा कभी ना किसी से कहूं हो एके कर्म करते जाए धर्म कर कृपा मुझ पर कर दे मुझे निर्भयम है तुम में सब सब तुम में है पर्वत सागर सब तुम में है कोई कुछ भी कहे ना कोई भरम कर कृपा मुझ पर कर दे मुझे निर्भयम ओंकार कहता हे दिव्य दयानिधिम ना क्षमता मेरी कहुं मैं केहि बिधिम कर कृपा मुझ पर कर दे मुझे निर्भयम आगरम सागरम बुद्धि के नागरम कर कृपा मुझ पर कर दे मुझे निर्भयम परिचय :-  ओंकार नाथ सिंह निवासी : गोशंदेपुर (गाजीपुर) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं,...
अंतर्मन
गीत

अंतर्मन

रशीद अहमद शेख 'रशीद' इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** क्या कहूँ बात उलझन की। मत पूछो अंतर्मन की। छा गया बहुत कोरोना। पीड़ित जग का हर कोना। दृग झड़ी लगी सावन की। मत पूछो अंतर्मन की। लगता कर्फ्यू कोरोना। दुर्भर है जगना-सोना। सीमा है घर-आँगन की। मत पूछो अंतर्मन की। सूने बाज़ार सभी हैं। धीमे व्यापार अभी है। दुर्दशा हुई जन-जन की। मत पूछो अंतर्मन की। नव विवाहिता थी सोना। ले गया कंत कोरोना। है दशा बुरी विरहन की। मत पूछो अंतर्मन की। परिचय -  रशीद अहमद शेख 'रशीद' साहित्यिक उपनाम ~ ‘रशीद’ जन्मतिथि~ ०१/०४/१९५१ जन्म स्थान ~ महू ज़िला इन्दौर (म•प्र•) भाषा ज्ञान ~ हिन्दी, अंग्रेज़ी, उर्दू, संस्कृत शिक्षा ~ एम• ए• (हिन्दी और अंग्रेज़ी साहित्य), बी• एससी•, बी• एड•, एलएल•बी•, साहित्य रत्न, कोविद कार्यक्षेत्र ~ सेवानिवृत प्राचार्य सामाजिक गतिविधि ~ मार्गदर्शन और प्रेरणा लेखन विधा ~ कविता,गीत...
मौन
कविता

मौन

धैर्यशील येवले इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मैं एकांत में संवादहीन बैठा हूँ सबसे दूर अलग हो परिलक्षित भर हो रहा मौन। विचारों का सुप्त ज्वालामुखी फुट पड़ा है दहकता बहता लावा लगता है मुझे भस्म कर देगा भीतर क्या क्या नही भर रखा था मैंने काश की बह जाने देता समय समय पर किंतु मैं दबाता रहा विचारों को आज जब धारण किये बैठा हूँ मौन सत्य की प्रथम सीढ़ी पर ही बह निकला है मेरा सच। कितना कठिन हो रहा है स्वयं को खाली करना यम नियम संयम की राह पर चल पड़ा हूँ धारणा मजबूत हो रही है अब दूर नही है समाधि। परिचय :- धैर्यशील येवले जन्म : ३१ अगस्त १९६३ शिक्षा : एम कॉम सेवासदन महाविद्याल बुरहानपुर म. प्र. से सम्प्रति : १९८७ बैच के सीधी भर्ती के पुलिस उप निरीक्षक वर्तमान में पुलिस निरीक्षक के पद पर पीटीसी इंदौर में पदस्थ। सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर hindirakshak.com द्वारा हिंदी रक्षक २०२...
कभी बारिश की नमी थी
कविता

कभी बारिश की नमी थी

सुभाष बालकृष्ण सप्रे भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** धरा पर कभी बारिश की नमी थी, वन विकास की गति अब थमी थी, शहरीकरण ने उजाडे आवास हमारे, पेडो के आशियाने हमारी सर जमी थी, गर्मी से निजात दिलाता, न है अब कोई, सर छ्पाने सघन छाया की, बेहद कमी थी, दाने-दाने को तलाशना, मज़बूरी है, हमारी, पानी के बिना हलक में, बची न नमी थी, याद आते हैं, जंगल के, वो हरे भरे, नज़ारे, क्या यही, वो, हमारी सस्य श्यामला जमीं थी. परिचय :- सुभाष बालकृष्ण सप्रे शिक्षा :- एम॰कॉम, सी.ए.आई.आई.बी, पार्ट वन प्रकाशित कृतियां :- लघु कथायें, कहानियां, मुक्तक, कविता, व्यंग लेख, आदि हिन्दी एवं, मराठी दोनों भाषा की पत्रीकाओं में, तथा, फेस बूक के अन्य हिन्दी ग्रूप्स में प्रकाशित, दोहे, मुक्तक लोक की, तन दोहा, मन मुक्तिका (दोहा-मुक्तक संकलन) में प्रकाशित, ३ गीत॰ मुक्तक लोक व्दारा, प्रकाशित पुस्तक गीत सिंदुरी हुये (गीत सँकलन...
ज़िंदगी… “अनछुए लम्हें”
कविता

ज़िंदगी… “अनछुए लम्हें”

निर्मल कुमार पीरिया इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** अधखुले लबों में छूपी, अनकही, कहानियां, हर्फ़ों को हैं, तरस रही, अनजानी, मजबूरियां... कहने को तो, हैं बहूत, लब, लरज जाते मगर, ढल नही पाते, शब्दों में, बह जाते, पाती पे मगर... बिखरें, भीगे, उन हर्फ़ों को, क्यो ना, मोती सा, सहेज ले, खो ना जाये, पाती भीगीं, उसे वक्त से, समेट ले... बैठ, मिल हम, उन पलों को, ख़ुद में, क्यो ना, टटोल ले, अनछुए, लम्हों को, क्यो ना, आओ फिर, उकेर ले... उत्कीर्ण करे, दास्तां नई, अधर पँखुरी, जरा खोल दो, उर छुपे, भावों को फिर, सहज, प्रेम स्याही, से घोल दो... धर दो, अधरों को, अधर पर, शब्द, सांसो में, घुल जाएंगे, लब लरज़ते, गर, कह ना पाये, धड़कनो से, लिख हम जाएंगे... सत्य सँग, वो सुंदर भी होगा वही भावों की, गँगा बहेगी, सहेजेंगे, प्रतीति जटा में, चेतना, "निर्मल" शिव सी होंगी... होगी ना कोई, दास्तां अधूरी, स्वरुप इसक...
जियो जिंदगी
ग़ज़ल

जियो जिंदगी

अनूप कुमार श्रीवास्तव "सहर" इंदौर मध्य प्रदेश ******************** जियो जिंदगी जीत दुनिया को लो, बात ख़ुदा की चलें बंदगी जीत लो। इतनी तन्हाई यहां है किसके लिए, बंद पलकों में मंजर सभी खींच लो। फूल उसका बदन तीखें जैसें नयन अंजुरी अंजुरी सी उतरी मेरे सपन। एलौरा की दिवारों में अब उकेरो उसे, मन अंजता में उसको बसालों जरा। बंद पलकों में मंजर सभी खींच लो, जैसे चन्दन से जग सारा यें सींच लों। यतन के जतन भी बहुत खूब किए गुनगुनानें की खातिर कोई गीत लों। बांसुरी राधा बजाएं कहीं श्याम की पीर भुलाने की खातिर यहीं प्रीत लों। परिचय :- अनूप कुमार श्रीवास्तव "सहर" निवासी : इंदौर मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन...
बारा मासी गीत
गीत

बारा मासी गीत

राधेश्याम गोयल "श्याम" कोदरिया महू (म.प्र.) ******************** तुम्हारे बिन मै न जियुंगी दिलों जानी, जैसे मछली बिन पानी। हो पिया जैसे मछली बिन पानी.......तुम्हारे बिन....... चैत्र, बैसाख ऐसे बीते आई याद सुहानी, कोयल, पपिहा की वाणी सुनकर हो गई पानी पानी... तुम्हारे बिन...... जेठ असाड़ बड़ पीपल पूजे, कई मानता मानी, धूं-धूं करके महीने बीते, जैसे काला पानी.......... तुम्हारे बिन....... सावन भादों में बरखा आई, लाई याद पुरानी, झूले पड़ गए नीम पुराने,चहुं और पानी ही पानी....... तुम्हारे बिन........ कुंवार कार्तिक शरद ऋतु आई, ठंडी हुई मनमानी, मेला देखन सब सखी जावे, मै बैठी अनमानी........ तुम्हारे बिन........ अगहन पोष मास जब आए, बड़ गई मन हैरानी, छोटे दिवस रैन भई लंबी, कठिन हुई जिंदगानी........ तुम्हारे बिन........ माघ फागुन बसंत ऋतु आई, रंगो ने चादर तानी, "श्याम" हो...
उजाला
कविता

उजाला

मईनुदीन कोहरी बीकानेर (राजस्थान) ******************** उजाले के लिए बचा कर रखना अपनत्व की बाती प्यार के तेल में सींच कर, फिर स्नेह का उजाला करना। बुराई की आंधी बुझा ना पाए किसी के दिल का दिया प्यार के आंसुओं से, फिर अंधेरे में उजाला करना। बचपन और जवानी उतार-चढ़ाव की है कहानी इसे सहज कर रखना किसी गरीब की अभिलाषा में, फिर उम्मीद का उजाला करना।। नफरत के इस दौर में घर में भी डर लगता है कोलाहल से भरी हवाओं में प्रदूषण को पर्यावरण में बदलने, फिर आशा की किरण से उजाला करना। वैष्विक महामारी के वायरस को अलविदा करने की मुहिम में सवा करोड़ देशवासियों मुश्किल की घड़ी में, फिर हौसलों के चिराग से उजाला करना। परिचय :- मईनुदीन कोहरी उपनाम : नाचीज बीकानेरी निवासी - बीकानेर राजस्थान घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहान...
ग़म भुलाने की
ग़ज़ल

ग़म भुलाने की

अनन्या राय पराशर संत कबीर नगर (उत्तर प्रदेश) ******************** ग़म भुलाने की बात क्यों ना करें मुस्कुराने की बात क्यों ना करें अपनी तहज़ीब है रिवायत है हम ज़माने की बात क्यों ना करें क्या ये शिकवे ज़ुबां पे रखते हैं दिल चुराने की बात क्यों ना करें बैठकर साथ हम बुजुर्गों के घर घराने की बात क्यों ना करें वो जो मरता है मेरी बातों पे उस दीवाने की बात क्यों ना करें बात क्यों कर हो आंधियों की भला आशियाने की बात क्यों ना करें इतनी ख़ामोशियां भी अच्छी नहीं गुनगुनाने की बात क्यों ना करें परिचय :- अनन्या राय पराशर निवासी : संत कबीर नगर (उत्तर प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, रा...
रिश्ते सब अनजान हो रहे
कविता

रिश्ते सब अनजान हो रहे

प्रो. आर.एन. सिंह ‘साहिल’ जौनपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** रिश्ते सब अनजान हो रहे गिरगिट सा इंसान हो रहे अब कैसी उम्मीद किसी से दिल से जब बेजान हो रहे दौर कठिन है वक़्त बुरा है स्वार्थ का सिर पे भूत चढ़ा है झूँठ की है चौतरफ़ा चाँदी सत्यव्रती हलकान हो रहे शासन में धृतराष्ट्र है बैठे हैं मदमस्त नशे में ऐंठें ये परिदृश्य अशुभ लगते हैं धूमिल सब प्रतिमान हो रहे किस पर करें यक़ीन बताओ दुविधा में कुछ राह दिखाओ बहुरूपियों का दौर है जैसे रूप बदल भगवान हो रहे बगुला भगत सभी लगते हैं छिप छिप स्वाद मधुर चखते हैं साहिल क्रमशः विमुख हो गए खंड खंड अरमान हो रहे परिचय :- प्रोफ़ेसर आर.एन. सिंह ‘साहिल’ निवासी : जौनपुर उत्तर प्रदेश सम्प्रति : मनोविज्ञान विभाग काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी, उत्तर प्रदेश रुचि : पुस्तक लेखन, सम्पादन, कविता, ग़ज़ल, १०० शोध पत्र प्रकाशित, मनोविज्ञ...
कवि का जीवन
कविता

कवि का जीवन

अख्तर अली शाह "अनन्त" नीमच (मध्य प्रदेश) ******************** कवि का जीवन संस्कारित पथ, तारणहार कवि है। कुरीतियाँ हैं व्याधि अगर तो, बस उपचार कवि है।। गुरु है वो जो "अनंत" कहता, उसकी कथनी मानें। जिसपे टिकी सभ्यता की छत, वो दीवार कवि है।। अंधकार में रहकर के कवि, करे उजाला घर-घर। भले हलाहल पीले वो पर, बनता सच्चा रहबर।। "अनन्त" धुन का मालिक है वो, निर्देशित है खुद से। उसका जीना उसका मरना, कब होता है डरकर।। खिला कमल है कवि कीचड़ में, सबकी करे भलाई। तुम बारूदी कर लो खुद को, वो है दियासलाई।। "अनन्त" नम भूमि में ही तो, जीवन नित फलता है। बिना प्रयासों के कब मिलती, लोगों दूध मलाई।। कवि वही जो संप्रभु शक्ति, से ताकत पाता है। दरबारों में नहीं उठाता, हाथ न यश गाता है।। आती-जाती सरकारों के, क्यों "अनंत" गुणगाए। सेवक बनकर बंदो का जो, ऊपर से आता है।। परिचय :- अख्तर अली शाह "अनन्त" पिता : क...
रंगो से प्रेम करके देखो
कविता

रंगो से प्रेम करके देखो

संजय जैन मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** प्रेम मोहब्बत से भरा, ये रंगों त्यौहार है। जिसमें राधा कृष्ण का जिक्र बेसुमार है। तभी तो आज तक अपनो में स्नेह प्यार है। इसलिए रंगों के त्यौहार को, हर मजहब के लोग मनाते है।। होली आपसी भाईचारे और प्रेमभाव को दर्शाती है। और सात रंगों की फुहार से, 7-फेरो का रिश्ता निभाती है। साथ ही ऊँच नीच का भेद मिटाती है। और हृदय में सभी के भाईचारे का रंग चढ़ती है।। सात रंगो के ये रबिरंगे रंग सभी को भाते है। और अपनो के दिलो से कड़वाहट मिटाते है। रंगो में रंग मिलकर नये रंग बन जाते है। आपस में रंग लगाकर नये नये दोस्त बनाते है। और नये भारत का निर्माण मिल जुलकर करते है।। परिचय :- बीना (मध्यप्रदेश) के निवासी संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं। करीब २५ वर्ष से बम्बई में पब्लिक लिमिटेड कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत श्री जैन शौक से लेखन में सक्र...
माँ कौशल्या ने राम जी से पूछा
कविता

माँ कौशल्या ने राम जी से पूछा

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** जब प्रभु राम १४ वर्ष के बनवास के बाद वापस आये और माँ कौशल्या से मिलने गए तो अत्यन्त दुखी होने के कारण उन्होंने अपनी कोख को ही अभागिन कह देखे प्रभु राम कितनी शालीनता से उनकी पीड़ा को हर लिया और माँ कैकेयी, हनुमान जी, भरत जी और लक्ष्मण जी का मान बढ़ाया। माँ कौशल्या ने राम जी से पूछा राम क्यों दुःख भोगने को इस अभागिन कोख आया, राज्य छुटा, वन गया, चौदह वर्ष तक कष्ट पाया। राम जी ने मुस्करा कर उत्तर दिया हूँ परम सौभग्यशाली मातु तेरी कोख पाया, शीश धर आज्ञा पिता की, मैंने जग में मान पाया। जग को कुछ आदर्श देने आया है माँ राम तेरा, तप के कंचन सा निखरना, मातु था उद्देश्य मेरा। कैकेयी माता ने अपजस सह मुझे कंचन बनाया। हूँ परम सौभग्यशाली... यदि न जाता वन तो हनुमत और लेखन सेवा न पाते, त्याग की प्रतिमूर्ति मेरे भरत भैया बन न पाते। में बंधा था ...
प्रीत कान्हा से
कविता

प्रीत कान्हा से

विमल राव भोपाल मध्य प्रदेश ******************** कान्हा तुम संग प्रीत लगाई मन हीं मन पछताई मैं। विरह अगनी में ऐसी उलझी आपही रास रचाई मैं॥ भूल गई मैं सांझ सवेरा द्वार द्वार फिर आई मैं। कहाँ गयो चितचौर कन्हैया नैयनन ढूंढ ना पाई मैं॥ गोपियन संग जो रास रचायों मोहे कन्हैया नाच नचायों। घैर लयी पनघट कान्हा नें प्रेम रंग कों राग बजायों॥ मैं आगे कान्हा पीछे बृज की गलियन, दौड़ाई मैं। हिय में ऐसो, बसो नंदलला याहे एक क्षण भूल ना पाई मैं॥ सखी श्याम सलोनों कितै गयो याकि बंशी चुरा ल्ये आई मैं। काऊ देखो हैं कुँज गलिन कान्हा यासों प्रीत भुला ना पाई मैं॥ परिचय :- विमल राव "भोपाल" पिता - श्री प्रेमनारायण राव लेखक, एवं संगीतकार हैं इन्ही से प्रेरणा लेकर लिखना प्रारम्भ किया। निवास - भोजपाल की नगरी (भोपाल म.प्र) विशेष : कवि, लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं प्रदेश सचिव - अ.भा.वंशावली संरक्षण एवं संवर्द्धन संस्था...
प्रेम रंग ले खेले होली
गीतिका

प्रेम रंग ले खेले होली

भीमराव झरबड़े 'जीवन' बैतूल (मध्य प्रदेश) ******************** गीतिका आधार छंद - चौपाई विधान - कुल १६ मात्राएँ, आदि में द्विकल त्रिकल त्रिकल वर्जित, अंत में गाल वर्जित समांत - ओली, अपदांत हँसी, खुशी, मस्ती की टोली। प्रेम रंग ले खेले होली।।१ चुन्नू-मुन्नू के मुखड़े अब, लगे उकेरी है रंगोली।।२ लाल हुआ है किंशुक का तन, सुन बसंत की हँसी ठिठोली।।३ महुए पर चढ़ दाग रहा है, फागुन पिचकारी से गोली।।४ हरिया धनिया देख चहकते, अटी अन्न से खाली खोली।।५ हुए पड़ोसन के स्वर मीठे, कोकिल ने मुख मिश्री घोली।।६ सरस लेखनी कहती है बस, 'जीवन' के भावों की बोली।।७ परिचय :- भीमराव झरबड़े 'जीवन' निवासी : बैतूल मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सक...
मन में कोई दुविधा मत रखो
कविता

मन में कोई दुविधा मत रखो

होशियार सिंह यादव महेंद्रगढ़ हरियाणा ******************** हँसो, खेलो, कूदो, मुस्कुराओ, सुख दुख हरदम स्वाद चखो, दूसरों की सहायता कर देना, मन में कोई दुविधा मत रखो। काम करो सदा सोच समझ, वरना पड़ जाता है पछताना, जो रूठकर जाना चाहते हो, बस उन्हें प्यार से समझाना। राह चलना सदा हँसते गाते, देश विकास का एक तराना, आगे बढऩे की ललक रखो, एक दिन याद करेगा जमाना। पाप कर्म जो करता जगत में, हो जाता जन का जरूर नाश, आजादी मिली हमको प्यारी, बनकर नहीं रहना कभी दास। संसार में कुछ करने को आये, पाप कर्म में कभी नहीं गंवाये, दाता का निर्मित किया संसार, होठों पर ये खुशियां गुनगुनाये। सरस,रसधार मन में रखना है, पाप, नीच, अधम मत बनना, खुद भी बढ़ों औरों को बढ़ाए, बस दिल में ताना बाना बुनना। सिकंदर जैसे कितने ही आये, एक दिन उनका सूर्य भी अंत, बस चार दिनों की जिंदगी है, कह गये कितने ही साधु संत। मन में कोई भी...
एक अभिलाषा
कविता

एक अभिलाषा

मनोरमा जोशी इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** जीवन का अंतिम पहर, चहुँ और बरस रहा कहर। क्षण भंगुर है जीवन, कब पंक्षी सा उड़ जाये, सोच मन अतीत, में खो जाता है। कभी वर्तमान, कभी भूतकाल, मैं खो जाता है। भरता हैं उडा़न, तोड़ बंधन, झरनों सा बहता। गंगा की लहरों, सा लहराता, हिलोर लेता, बन पतंगा उड़ता, कभी थमता नहीं। कुछ कर गुजरने, की प्रबल जिज्ञासा, कुछ आशा अभिलाषा। शब्दों से बुनता जाल, आता है ख्याल, अपनी यादें अमिट छाप, जिससें सार्थक हो जीवन यादों के झरोखें जहाँ हो, भूलीं बिसरी सुनहरी, यादें अपनी बातें अपनी बातें। परिचय :-  श्रीमती मनोरमा जोशी का निवास मध्यप्रदेश के इंदौर में है। आपका साहित्यिक उपनाम ‘मनु’ है। आपकी जन्मतिथि १९ दिसम्बर १९५३ और जन्मस्थान नरसिंहगढ़ है। शिक्षा - स्नातकोत्तर और संगीत है। कार्यक्षेत्र - सामाजिक क्षेत्र-इन्दौर शहर ही है। लेखन विधा में कविता और लेख लिखती हैं। ...
रूपगर्विता
कविता

रूपगर्विता

धैर्यशील येवले इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** तुम शताब्दी एक्सप्रैस गर्व से भरी सुख सुविधा संपन्न नित्य गुजर जाती हो मुझ पर से। मैं एक छोटा सा गुमनाम सा रेलवेस्टेशन तनिक भी कभी देखा नही तूने मेरी और मैं नित्य तुझ रूपगर्विता को निहारता हूँ अनगिनत भावो के साथ तुम मुझ में प्रतिदिन लघु होने का भाव तीव्रता से जगा जाती हो आज कुछ आतताई यो ने तेरे पथ पर अवरोध उत्पन्न कर दिया है, तू खड़ी है मुझ पर मजबूरी वश मैं किंकर्तव्यविमूढ़ सा अपलक तुझे निहार रहा हूँ कभी तुझे तो कभी स्वयं को देख रहा हूँ आनंदविभोर हो इस क्षण को अक्षुण्य रखूंगा ह्रदय में जीवन भर मुझे पता है कुछ ही क्षणों में तुम चली जाओगी और नित्य गुजरोगी मेरे ऊपर से मुझे देखे बगैर। तुम रूपगर्विता दर्प से भरी मैं अकिंचन छोटा गुमनाम सा रेलवेस्टेशन। परिचय :- धैर्यशील येवले जन्म : ३१ अगस्त १९६३ शिक्षा : एम कॉम सेवासदन महाविद्याल बुरहानप...
बादल रुक जा
कविता

बादल रुक जा

भारमल गर्ग "विलक्षण" जालोर (राजस्थान) ******************** बादल रुक जा क्यों घटा छाई है, परवाने घूम रहे हैं, क्यों छाया दिखाई है। नवोद्भिद् एहसास कृशानु रोहिताश्व दिखाई है, संकेत प्रपंचरंध्रा होंगी छद्मी आवेश नहीं बना विवेक रह जा चरित्रता के संग पहचान होगी तेरी भी जब होगा तेरा अचल रंग बिखरे नहीं तू ढंग तेरा होगा अग्निशिखा के सम्मान रुख बदल दे अपना भी स्वयं पर आजमा सम्मान। दैवयोगा दैवयोगा हैं, परिणिता पार्थ को दिखाई है, सुरभोग कलयुग में अनर्ह के साथ सजी है, सहस्रार्जुन अब तिरस्कार हो रहा मेरा इस तमीचर ने विगत अदक्ष वल्कफल कि भांति शब्दों में ढाल सजाई है। सुखवनिता नहीं रह पाती सुजात बनकर, दर्प लोग अब मिथ्याभिमान आक्षेप लगाते हैं, पुनरावृत्ति अब कराने लगे धनाढ्य अनश्वर की प्रतीक्षा में अवबोधक का अनुदेशक अलग-अलग अन्तर्ध्यान भी अशुचि अशिष्ट पराश्रित प्रज्ञाचक्षु क...
तेरा थाल सजाऊँगी
भजन

तेरा थाल सजाऊँगी

ममता श्रवण अग्रवाल (अपराजिता) धवारी सतना (मध्य प्रदेश) ******************** आओ साई घर पर मेरे, तेरा थाल सजाऊँगी। रुचि रुचि के पकवान बना मैं, तुझको भोग चढ़ाऊंगी।। तुम आओगे जब घर मेरे, भर जायेंगे भंडार मेरे। मेरे घर के खालीपन में, रच जायेंगे अरमान मेरे।। नही रहेगी कोई प्यास तब, और न कोई रहे रिक्तता। चारो तरफ रहे उजाला, और हो मन में एक पूर्णता। फिर रूखा सूखा बना बना मैं तुझको रोज खिलाऊंगी। कहीं लगे न कड़वा तुझको, मैं चख चख तुझे खिलाऊँगी।। तू भी समझ कर भाव मेरे, बडे प्यार से भोजन करना। और जैसे भरना मेरी झोली, वैसे ही तुम सबकी भरना।। परिचय :- ममता श्रवण अग्रवाल (अपराजिता) निवासी - धवारी सतना (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फ...
रंगीला राजस्थान
कविता

रंगीला राजस्थान

प्रियंका पाराशर भीलवाडा (राजस्थान) ******************** सभ्यता, संस्कृति, मान्यता, विश्वास है यहाँ विद्यमान भिन्न-भिन्न रंगों से सुशोभित मेरा रंगीला राजस्थान धरातल का एक भाग रेतीला तो दूसरा भाग हरा-भरा इतिहास यहाँ के लोगों की वीरता के किस्सों से भरा पद्मिनी का जौहर, मीरा की भक्ति, पन्ना का बलिदान प्रताप, चेतक, राणा सांगा के रण कौशल पर अभिमान महल, मंदिर, दुर्ग, हवेलियों की है अद्भुत शिल्पकारी घूमर, कालबेलिया जैसा लोकनृत्य, बणीठणी की चित्रकारी संत, सत्तियों, कवियों और भगतो की है आन-बान यहाँ की सांस्कृतिक धरोहर पर देश को है अभिमान आकर्षक पर्यटन स्थल, मेले और हाट बाजार रंगीले राजस्थान का सजीला है श्रृंगार त्यौहारो का संगम, अतिथि का सम्मान लोकगीतो की गूँज संग तानपुरे की तान घूंघट की मर्यादा और पगड़ी की शान शौर्य, साहित्य, कला, संगीत की है यहाँ खान मेरे रंगीले राजस्थान का अनंत है गुणगान ...
भोला ना भईल दर्शनवां
भजन

भोला ना भईल दर्शनवां

ओंकार नाथ सिंह गोशंदेपुर (गाजीपुर) ******************** https://youtu.be/iA7yWdwj8d8 भोला ना भईल दर्शनवां बीतल जाला सवनवां ना भोला ना भईलं दर्शनवां बीतल जाला सवनवां ना बादल गरजे चमके बिजुरिया रिमझिम बुनिया रात अनरिया नया रोगवा चलल बा करोनवां बीतल जाला सवनवां ना भोला......... हर मंदिर के वंद केवरिया बहरे खाढ बाटे सिपहिया चला बहरे से करब अरचनवां बीतल जाला सवनवां ना लीखे ओंकार ई त सवनी कजरिया ना लागे काहू क नजरिया रही अगले बरस क अरमनवां बीतल... ... भोला ना भईलं....... परिचय :-  ओंकार नाथ सिंह निवासी : गोशंदेपुर (गाजीपुर) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। https://youtu.be/4NSBGzwFVpg आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन...