व्यवस्था को फाँसी दो
माधवी मिश्रा (वली)
लखनऊ
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अरे व्यवस्था को फाँसी दो
नौनिहाल जो सींच रहे
जिस पूंजी के लिये खोल
माँ की तस्वीरें खीच रहे
दौड़ रहे प्रभुता के पीछे
अपनी, मर्यादा को भूल
संस्कार आर्यों की धोकर
चाट रहे पश्चिम की धूल
उपभोक्ता संस्कृति नही थी
अपने भारत की सन्तान
इसको नंगा करके तुमने
मिटा दिये अपनी पहचान
आज अगर कानून बनाकर
मृत्यु दण्ड तुम देते हो
क्यों लगता है तुमको ऐसा
समाधान कर लेते हो?
नारी का सम्मान खरीदे
भेज रहे आगे आगे
मन की आखों से सोये
दिखते बस जागे जागे
अपनी सब पहचान छुपाते
प्रतिकृति बन आधुनिक हैं
पॉप सांग पर थिरक रहे हो
कहते हो हम युनिक हैं।
पूर्वज से मुख मोड़ चुके हो
जग से नाता तोड़ चुके हो
भाग दौड़ पैसो के खातिर
बचपन सूना छोड़ चुके हो
बालशुलभ मन को समझाए
नैतिकता अब कौंन बताये
आधी और अधूरी शिक्षा
ये पागलपन और बढ़ाये।
केवल बस सरकार बनाये
नये खयालों की दीवार
कहाँ-क...





















