दादी अम्मा तुम बहुत याद आती हो!
मीना सामंत
एम.बी. रोड (न्यू दिल्ली)
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धीर थी, गम्भीर थी, संतुलित सी भाषा थी,
तुम आंगन की तुलसी थी, मैं तुम्हारी आशा थी।
पहाड़ी नदियों की छल-बल नहीं, सागर सी सूरत थी।
खारापन तुमको छू नहीं पाया, विनम्रता की मूरत थी।
नदी, नालों से डरने वाली मैं, तुम ही मेरी नौका थी।
महानगरों की तपिश नहीं, पहाड़ी हवा का झोंका थी।
लंबे धान के खेतों में, सलीके से चलना सिखाती थी,
थोड़े-थोड़े पैसों को गिनकर, मुझे दिखाती थी।
मेरे स्वाभिमान के साथ, मुझे अपनाती थी।
परछाई थी उसकी मै, जहां कहीं वो जाती थी।
लाचार, बेबस महिला नहीं, सैनिक कुल की बेटी थी,
दस भाई, बहिनों में सबसे दुलारी और चहेती थी।
मुंह अंधेरे उठकर, धोती जब वो पहनती है,
धोती के कोने में, एक छोटी गांठ लगाती है।
चेहरा आज भी चमकता है, "संतोष" से खाती है,
दांत आज भी असली हैं, कच्चे चावल चबाती है।
परिचय :- मीना सामंत
एम.बी. रोड...





















