ज़ख्म
मनीषा व्यास
इंदौर म.प्र.
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ज़ख्म सबके बराबर हैं,
तेरे हों या मेरे हों,
रेशमी ताकत भी यहां,
मजबूर है बताना चाहती थी।
चारों तरफ खोफ़ है,सन्नाटा है पर,
यकीनन बिखरे हुए पत्तों
को जोड़ना चाहती थी।
मां आसुओं की
पहचान रखती है,
दो दिन पहले भी बहे
हों तो जान लेती है।
वही है जो जिंदगी के
हर दर्द जानती है।
हर रिश्ते तराशने के
गुर जानती है।
कोई दौलतमंद नहीं है,
और न कोई रंक है।
सब सिकंदर हैं यहां
वो ये बताना चाहती थी।
परिचय :- मनीषा व्यास (लेखिका संघ)
शिक्षा :- एम. फ़िल. (हिन्दी), एम. ए. (हिंदी), विशारद (कंठ संगीत)
रुचि :- कविता, लेख, लघुकथा लेखन, पंजाबी पत्रिका सृजन का अनुवाद, रस-रहस्य, बिम्ब (शोध पत्र), मालवा के लघु कथाकारो पर शोध कार्य, कविता, ऐंकर, लेख, लघुकथा, लेखन आदि का पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन
सम्मान - हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी ...
























