खुद से रूठा बैठा हूं
राजेन्द्र लाहिरी
पामगढ़ (छत्तीसगढ़)
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खुद ही खुद से रूठा बैठा हूं,
जाने क्यों इस कदर ऐंठा हूं,
जिंदगी में कभी निखर नहीं पाया,
सौंपा गया कार्य कर नहीं पाया,
सामान्य तालीम मिली थी
तलवे चाटने वाली,
इंसानों को इंसानों से बांटने वाली,
खुराफाती सोहबत में रहकर भी,
मानसिक गुलामी वाली
परिस्थितियां सहकर भी,
उगा था मन में एक कोमल फूल,
उठा लूं मैं भी सामाजिकता का धूल,
चल पड़ा था उस कठिन राह में,
डूबकर रहना था समाज के पनाह में,
यह राह जितना समझता था
था नहीं उतना आसान,
जनजागृति पर रखा पूरा ध्यान,
लोग मिलते गए हृदय में समाते गए,
अपने कार्य से मनमस्तिष्क में छाते गए,
पर देख न पाया कइयों का दूसरा रूप,
विद्रोह हो रहा था समाज से
खामोशी से रह चुप,
एक से एक नई खेप
मिशनरियों के आ रहे थे,
कुछ सच्चे चुपचाप लगे तो काम में
तो कुछ धुर विरोधियों में गोद ...


















