चंद लम्हो का हूँ मेहमान
दामोदर विरमाल
महू - इंदौर (मध्यप्रदेश)
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चंद लम्हो का हूँ मेहमान चला जाऊंगा।
में हूँ दुनिया से परेशान चला जाऊंगा।
ढूंढता रहता हूँ अक्सर एक पल सुकून का।
जवाब देने लगा अब कतरा कतरा खून का।
भीड़ दुनिया की मुझे रास नही आती है।
अब तो खुशियां भी मेरे पास नही आती है।।
करके अपनों को मैं हैरान चला जाऊंगा...
चंद लम्हो का हूँ मेहमान चला जाऊंगा।
में हूँ दुनिया से परेशान चला जाऊंगा।
करता रहता हूँ सफ़र रात दिन कमाने को।
लोग पीछे पड़े ज़िन्दगी की जंग हराने को।।
फिर भी रुकता नही मैं कभी थकता नही।
चंद रुपयों के लिए मैं कभी बिकता नही।।
करके तेरी गली सुनसान चला जाऊंगा...
चंद लम्हो का हूँ मेहमान चला जाऊंगा।
में हूँ दुनिया से परेशान चला जाऊंगा।
दिल के हालात बयां करने को अल्फ़ाज़ नही।
मेरी ये ज़िन्दगी किसी की मोहताज़ नही।।
मैं तो हूँ खुद्दार बड़ी शान से रहना है मुझे।
बेहरहम दुनिया से बस यह...




















