बेटियां
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रचयिता : मित्रा शर्मा
पापा की सहजादी होती है बेटियाँ
माँ की परछाई होती है बेटियां।
मिलती है बड़े नसिबवालों को बेटियां
आंगन की रौनक घर की मान होती है बेटियां ।
चार दिवारी से निकलकर कदम ताल में
बढ़ रही है आगे दे रही है साथ सुगम चाल में ।
बनकर योद्धा जय की नारा के हुंकार से
उड़ रही है विजय की ध्वजा लेकर आसमान पे ।
विदुषी के उपमा लेकर दे रही है रोशनी
शिक्षा रूपी बीज को कर रही है बोबनी ।
दूर हो अंधियारा कलम की हथियार से
चहुं ओर उजियारा हो बेटियों के नारा से
परिचय :- मित्रा शर्मा - महू (मूल निवासी नेपाल)
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