मौत या जिन्दगी
शरद सिंह "शरद"
लखनऊ
********************
ऐ जिन्दगी ठहर जरा,
तुझसे कुछ बात करना है।
तुझे तेरी असलियत को,
विस्तार से समझाना है।
क्या मुकाबला है तेरा,
और इस हॅसी मौत का,
इससे तुझे रूबरू कराना है।
कभी गर आया खुशी का,
अबसर तेरे रहते तो
अन्तर मे समाया रहा
गम का अजब डर,
डर रहता है तेरे रहते,
न जाने कब पलट जाये पल,
तू तो बढ़ जाती है साथ वक्त के,
और हम रह जाते बिखरे से।
किसी से मिलन तो किसी से जुदाई,
ऊँचे ऊँचे महलो को कर दे धराशाई।
पकड़ा बड़े जतन से किसी
मन्जिल को जब जब,
आगे है मन्जिल कह,
सपने दिखाये तब तब।
कभी किसी मन्जिल पर तू न रुकी है,
बढती सदा आगे ही आगे रही है।
आज गर लबों की मुस्कान बनी तो,
कल नयनो से अश्रुधारा बही है।
दिन के उजाले मे मिले,
कुछ पल सुकूँ के तो,
रात को नीद की दुश्मन बनी है।
तुझसे इतर देख इस मौत को तू,
यह देती है बस नीद सुकूँ की।
जिन्दगी से हारे थके हैं जो,
मौत नीद देती उनक...
















