दो श्वानों की बातेँ
श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
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एक घरेलु श्वान ने एक दिन,
सड़क पर पड़े
श्वान की दशा देखी!
दुबला पतला शरीर
खंडहर बन चुका था!
उसकी दुर्दशा देख घरेलु
श्वान को छटपटाहट हुई,
उसने सड़क के श्वान से पूछा-
कहाँ रहते हो??
ये कैसा हाल बना है तुम्हारा??
क्या यहाँ इंसान नहीं रहते??
सड़क का श्वान घिसटते पैरों से,
आधा गला शरीर,
उसके घाव से रक्त की
बूंदे रिस रही थीं,
आगे बड़ने की कोशिश करते हुए,
अपने दर्द से भरे
शरीर को समेटते हुए बोला-
प्रत्येक दिन हमारी और
हम जैसे हजारों कि जिंदगी
मौत से आँख- मिचौली खेलती है,
खाना- पीना हमारे
भाग्य में नहीं होता है ,
कभी किसी दरवाजे पर
आस लिए पहुंचते हैं ,
वहाँ डंडे की मार, दुत्कार
और प्रहार मिलता है ,
कभी कहीं हमको जिंदा
आग में जलाया जाता है ,
कभी आग से नहलाया जाता है !
इतना ही नहीं हमारे ...

















