मिथ्या गर्व
मालती खलतकर
इंदौर (मध्य प्रदेश)
********************
सरिता के
सगंमो से सिखो
मिलजुल कर
आगे बढना
सागर की उतुग
उठती लहरो से
सिखो उचे उठना।
निर्झर के जल से सिखो
नम्रता से नीचे झुकना
आमर् वृक्ष से सिखो
कोई प्रहार करे,
पत्थर मारे
फिर भी फल देना,
फल गिराना।
झुक कर पथिक
को छाया देती
वृक्ष की टहनी
से कुछ सिखो
गुनगुनाते भवंरे,
पाखी से सिखो
धैर्य धारण करना ह।
पर्वत पर खडे
वृक्षो से सिखो
जल मे अपने
प्रतिबिम्ब का निरन्तर
अन्वेषण करना
प्रकृति यह सब
मौन मे करती है
मानव के लिये
और मानव
हाँ मानव ऊंची
आवाज कर
कहता है
मैने दान दिया,
मैने दान किया
यह मिथ्या गर्व है
मानव का
मिथ्या गर्व है
मानव का।
परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ वि...
























