मेरा गाँव
सोनल सिंह "सोनू"
कोलिहापुरी दुर्ग (छतीसगढ़)
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बड़ा प्यारा था मेरा गाँव,
आँगन में थी पीपल छाँव।
जहाँ चलते हम पाँव -पाँव,
रुकने के थे अनेको ठाँव।
संगी, संगवारी बचपन के साथी,
खेल-खिलौने, कबरी गाय।
इन संग खेले बड़े हुए हम,
पीते कुएँ का मीठा पानी।
दादी-नानी की कहानी,
याद हमें रहती थी जुबानी।
दादा जी की मीठी बानी,
आसान बनाती थी जिंदगानी।
भोर की सुनहरी लाली,
हरी चादर ओढ़े धरती मतवाली।
फसलों का खेतों में लहराना,
धूम-धाम से हर त्यौहार मनाना।
पंछी को दाने खिलाना,
मीलों पैदल चलते जाना।
साथियों संग धूम मचाना,
बफिक्री में वक्त बीताना।
एक दूजे का हाथ बँटाना,
संग-संग रोना मुस्कुराना।
हर किसी से रिश्ता जुड़ जाना,
मिलकर गीत खुशी के गाना।
रोजी रोटी के चक्कर में,
छूट गया अब गाँव हमारा।
शेष रहा अब यही फसाना,
होगा मेरा कब लौट के जाना।
परिचय - सोनल ...



















