पता नहीं कैसे जिंदा हूं
राजेन्द्र लाहिरी
पामगढ़ (छत्तीसगढ़)
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ये है ही बेहद ताज्जुब की बात,
कि कुरेदा गया दिल
बचपन से जिसका
लेकिन कैसे
बचा हुआ है आज,
था जिनके भरोसे
ताना मिला उन्हीं की ओर से
कि जिंदा हूं आज
भी खाकर जूठन,
ना आयी लाज
बाल्यकाल में
और न शर्मिंदगी
ढलते जवानी में भी,
उलाहना देने वालों में
सभी निपुण हो चुके थे
रहे हों चाहे मित्र या संबंधी,
सबके ताने रहे
प्यार भरी बातों से
सुषज्जित मगर
थे भयंकर विध्वंशी,
अब जाके पता
चल रहा है कि
असल में मैं
फौरी तौर पर था
तेज पत्ते की
तरह अत्यावश्यक,
जिसे फेंका जाता है सर्वप्रथम,
मुझे भी फेंका गया मगर
मुझे तनिक भी
भनक लगने दिए बिन,
रोष तब और मिल गया सबको
जब पता चला कि मैं
खड़ा हो कैसे गया
अपने पैरों पर,
आंख मूंद भरोसा कर
अपनों व गैरों पर,
मेरा जीना न जीना
चलिए आज किसी के लिए
कम से कम कोई
मायने ...


















