राष्ट्र का मान
सुभाष बालकृष्ण सप्रे
भोपाल (मध्य प्रदेश)
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हिंदी है हमारे, राष्ट्र का मान,
जग मेँ मिला है इसे सम्मान,
गति इसकी कभी न रुक सकी,
इसकी प्रगती का हमेँ अभिमान,
बहुत दम्भ था आंग्ल भाषा को,
हिंदी को मिल गया तीसरा स्थान,
नहीँ वो दिन, अब अधिक दूर,
हिंदी को मिलेगा सर्वोच्च स्थान,
मृग मरीचिका है, विदेशी भाषा,
रक्खो सदा तुम, इसका ध्यान,
नासा मानता इस शक्ती का लोहा,
होना चाहिये सबको इसका भान,
सँगणक की अब भाषा,होगी हिंदी,
गर्व से करो, इसका मान सम्मान
करनी है शुरुवात नये पहल की,
गर्व से गाओ हिंदी के सब गान
परिचय :- सुभाष बालकृष्ण सप्रे
शिक्षा :- एम॰कॉम, सी.ए.आई.आई.बी, पार्ट वन
प्रकाशित कृतियां :- लघु कथायें, कहानियां, मुक्तक, कविता, व्यंग लेख, आदि हिन्दी एवं, मराठी दोनों भाषा की पत्रीकाओं में, तथा, फेस बूक के अन्य हिन्दी ग्रूप्स में प्रकाशित, दोहे, मुक्तक लोक ...























