धरती की पुकार
महेन्द्र सिंह कटारिया 'विजेता'
सीकर, (राजस्थान)
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गरमी बढ़़ रही जैवमंडल में,
मच रही है हाहाकार।
अपने खातिर मुझे बचालो,
कर रही धरती यही पुकार।....
देख तपिश ऐसा लगता,
मानों बरस रही है आग।
ग्लोबल वार्मिग के कारण,
जीवमात्र के हुए बुरे हाल।
समय रहते कर प्रायश्चित,
रे मनुज शीघ्र करलें चेत।
कुछ न बचेगा मुझ पर जब,
चिड़ियाँ चुग जायेगी खेत।
पौधारोपण से लो संवार,
गरमी बढ़ रही............।
बदलती जीवन शैली
बढ़ता औद्योगिकीकरण,
विलासिता पूर्ण
अनियंत्रित
नगरीकरण।
वर्षों से बोझ
निरंतर बढ़ रहा,
मानवीय भूलों
का दंश सहा,
बदइंतजामी आलम
भर रहा हुंकार,
गरमी बढ़ रही.........।
भावी पीढ़ी के बेहतर
भविष्य की ठाने,
भूल विलासिता पूर्ण
आदतों की माने।
संरक्षण के प्रति समझे
अपनी जिम्मेदारी,
सोचे उसकी जो है
अपनी महतारी।
प्रति पल बढ़ रहा
जो अत्याचार,
गरमी बढ़ रही.........























