टूटी है सिंदूर दानी
अनन्या राय पराशर
संत कबीर नगर (उत्तर प्रदेश)
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पैरों में गाढ़ा महावर हाथ में मेहंदी रची है
और माथे पर चमकती रेख कुमकुम की बची है
बोलती बिंदिया सलोनी और होंठो पे है लाली
पलकों पे सपने हजारों हाथ में पूजा की थाली
आंसूओं से आचमन कर और जलाकर के दिए
मांगती है वर कि पति मेरा जुग जुग जिए
बस यही है कामना वो जल्द आए
और क्या बीती है कैसे सब सुनाए
हाथ से अपने मेरा श्रृंगार करते
और मेरी मांग भी खुद ही से भरते
पर नियति का खेल भी है क्या निराला
ऐसे कैसे भाग्य का सिक्का उछाला
एक चिट्ठी आई है लेकर कहानी
टूटी है सिंदूर दानी...
एक पल में है लुटा संसार सारा
बेंदी बेसर और नथनी को उतारा
कानो से बालों को खुद ही नोच डाला
और कुमकुम हाथ से ही पोछ डाला
आंख में बस आंसूओं की लड़ी थी
मौन होकर एक कोने में खड़ी थी
चित्र पर बस हाथ अपने धर रही थी
और पति के साथ ही में ...
























