मेरी कलम नहीं मेरे वश में
डॉ. सुभाष कुमार नौहवार
मोदीपुरम, मेरठ (उत्तर प्रदेश)
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मेरी कलम नहीं मेरे वश में
मुझे ‘क’ से कविता लिखनी थी,
कविता के लिए कविता लिखनी थी।
बड़े शब्द सँजोए थे मैंने,
एक प्रेम धार जो बहनी थी।
पर ‘क’ से कातिल दिखा गई
जो खाते हैं झूठी कसमें...
मेरी कलम नहीं मेरे वश में
‘ख’ से खुश मिजाज होकर मुझको,
कुछ गीत खुशी के लिखने थे,
बोली मुझसे खामोश रहो,
तुम कुछ तो धीरज धरा करो।
जो खास तुम्हारे बनते हैं,
धोखा है उनकी नस-नस में...
मेरी कलम नहीं मेरे वश में
‘ग’ से गर्वित होकर मैं कुछ क्षण,
अपने गणतंत्र पे इतराया।
बोली चौकन्ने रहो सदा,
बुन रहा जाल काला साया।
जो पाक नाम से दिखते हैं,
है ज़हर भरा उनके मन में...
मेरी कलम नहीं मेरे वश में
‘घ’ से घर लिखना चाहा तो,
बोली घमंड किस बात का है?
माँ-बाप रहें वृद्धाश्रम में,
बेटा-बंगले में सोता है!
ऐसा हर घर वो खाल...



















