खौफ साए में
विजय गुप्ता
दुर्ग (छत्तीसगढ़)
********************
खौफ साए में जिंदगी पल रही
लक्ष्य विहीन मंजिल चल रही।
श्रम योग ने कभी रखी शिलाएं
अब घेर रही हैं विभिन्न बलाएं
टीस देने लगी जो शेष आशाएं
खीझ जन्य चाल तो खल रही
भीत से सभी दिशाएं हिल रही
खौफ साए में जिंदगी पल रही।
लक्ष्य विहीन मंजिल चल रही।।
याद आते मेहनतों के वो मंजर
हल चलाए जहां भूमि थी बंजर
सफल पीढ़ी कमान थामे सुंदर
दीन बन कृतत्व कला गुम रही
सीख समय की साहस भर रही
खौफ साए में जिंदगी पल रही
लक्ष्य विहीन मंजिल चल रही।।
कार्यशाला पाठशाला संस्कार
हर सूरत प्रावधानों का विचार
सामर्थ्य अनुसार होता विस्तार
हीन सा जीवन चाह भटक रही
बीन बजाती जिंदगी सटक रही
खौफ साए में जिंदगी पल रही
लक्ष्य विहीन मंजिल चल रही।।
कर्मक्रान्ति ने कई रंग दिखाए
दिनचर्या सीमित परिधि आए
निराश मन को अब मौन भाए
सीप मोती से शिकायतें कर रही
रीझकर कलम इबारतें रच रही
खौफ साए में...





















