दोस्ती रिश्ता और दोस्त फरिश्ता
विशाल कुमार महतो
राजापुर (गोपालगंज)
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मुशीबत की क्या औकात रहे,
दोस्त खड़ा जब अपने साथ रहे,
मुशीबत की क्या औकात रहे,
दोस्त खड़ा जब अपने साथ रहे,
बड़े नादान वो लोग जिन्हें,
जिन्हें दोस्त में दुनिया दिखता नहीं,
दोस्ती से बड़ी कोई रिश्ता नहीं
औऱ दोस्त से बड़ा कोई फरिश्ता नहीं,
जब दोस्त की दोस्ती,
अपनी रंग दिखलाती हैं,
हो जाये दोस्ती बेमिसाल,
देख दुनिया दंग रह जाती हैं,
एक सच्चे दोस्त की छाया,
अपनी दोस्ती पे पड़ जाती हैं,
तब ना जाने क्यों उन रिश्तों में,
आत्मविश्वास बढ़ जाती है,
दोस्ती हैं कलम-स्याही की,
जो बिन स्याही कुछ लिखता नही
दोस्ती से बड़ी कोई रिश्ता नहीं
औऱ दोस्त से बड़ा कोई फरिश्ता नहीं,
दोस्ती थी राम-सुग्रीव की,
दोस्ती थी कृष्ण सुदामा की,
युगों युगों तक बनी रही,
क्या कहूं अब उस दोस्ताना की,
करो दोस्ती, निभाओ दोस्ती,
कभी बात न सुनो जमाना की,
संग में सदा ही दोस्त रहे,
कुछ खा...
























