सितम
सुरेखा सुनील दत्त शर्मा
बेगम बाग (मेरठ)
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सितम
इश्क को मेरे,
आजमाते क्यों हो,
दर्द को मेरे,
बढ़ाते क्यों हो,
ख्वाबों में मेरे बार-बार,
आते क्यों हो,
बीते वक्त की याद,
दिलाते क्यों हो,
इश्क को मेरे आजमा ते क्यों हो......
इतना सितम अब,
ढाते क्यों हो,
सब कुछ तो लूटा मेरा,
अब मेरी बर्बादियों पर,
जश्न मनाते क्यों हो,
इश्क को मेरे आजमाते क्यों हो....
दर्द भरी जिंदगी,
जीने दे सुकून से,
हर आहट पर,
अब अपने आने का,
एहसास कराते क्यों हो,
कर दिया जब,
नजरों से दूर ......बहुत दूर....
तो अपना बनाने की,
खता करते क्यों हो,
इश्क को मेरे आजमाते क्यों हो.....
सर्द रातों में,
ख्वाबों में आकर,
जाते क्यों हो,
बड़ा दम भरते थे,
अपने इश्क का,
अब अपनी मोहब्बत से,
"यकीं मेरा"
मिटाते क्यों हो.....
इश्क को मेरे,
आजमाते क्यों हो,
दर्द को मेरे बढ़ाते क्यों हो।।
परिचय :- सुरेखा "सुनील "दत्त...

























