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कविता

पतंगबाजी
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पतंगबाजी

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** हाथ में चरखी, चरखी में लिपटा धागा, चौकोर कागज की रंगीन पतंग हवा की मस्ती की लहरों में उड़ाता उड़ाने की ख़ुशी में सबसे हर्ष आनंद बढ़ाता सेहत बढ़ती, मिलती ताजी धूप प्रफ़ुल्लित मनमस्त हो चला जाता खुले वातावरण में चरखी औऱ डोर घुमाता कागज की सुंदर रंगीन पतंग आकाश में देख, ह्रदय खूब हर्षाता फेफड़ों में लाभकारी पतंग से खुशियाँ भारी पाता अच्छा ब्रीडिंग व्यायाम करता भारी ऑक्सीजन पर्याप्त मिलता ताकत भारी पतंगबाजी में करता प्रकृति से शरीर की प्रक्रिया नजरें प्रकृति से लड़ती लड़ता मन खुशियां मिलती न्यारी आसमान में उड़ाकर रंगीन पतंगों को रोगमुक्त का उपाय पतंग उड़ाकर मन को बढे चाव शरीर की पीड़ा जटिल रोग दूर होती पतंगबाजी से अनेक बीमारी एकाग्रता बनाए रख उड़ाए पतंग उड़ाए पतंग भगाओ परेशानी पतंग उड़ाने...
दहेज
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दहेज

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** जब तुम मेरे घर आना, अपने साथ थोड़ा दहेज जरूर ले आना !! कुछ अटैची, कुछ बक्से जिनमे भरे हो तुम्हारे बचपन के खिलौने, तुम्हारे बचपन के कपड़े, छुटपन की अठखेलियाँ और सहजता साथ ले आना !! तुम्हारी पवित्र मुस्कराहट को शृंगार की डिब्बे में भर लाना, अपने चेहरे की आभा और स्वयं की दृढ़ता भी साथ ले आना !! कुछ बक्सों मे अपने संस्कार अपनी संस्कृति साथ भर लेना! थोड़ा प्रेम और करुणा का आभूषण भी जरूर ले आना !! कुछ अटैची में अम्माँ-बाबुजी का आशीर्वाद और परिवार की खूबसूरत बातेँ उनकी यादें साथ में सहेज लाना !! अपना दुःख और अपनी तकलीफें, साथ ले कर आना, तुम्हारा हम कदम बन तुम्हारी पीड़ा आत्मसात कर लूंगा ऐसा भरपूर विश्वास मन मे ले कर आना !! सखी-सहेलियों की यादें, कुछ स्मृतियों के पन्ने भी रखना मत...
कुछ छूटा क्या
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कुछ छूटा क्या

प्रमेशदीप मानिकपुरी भोथीडीह, धमतरी (छतीसगढ़) ******************** ज़िन्दगी की कैसी भागम भाग तपती धुप और जलती है आग देखें दिल किसी का टूटा क्या पलट कर देखें कुछ छूटा क्या वकत के बदलते नित करवट कपड़ो मे पड़ते नित सिलवट अहसास का डोर है टुटा क्या पलट कर देखें कुछ छूटा क्या हालत की मार से बेखबर कैसे ज़िन्दगी कट रही है जैसे-तैसे अपनों से संगत भी जुटा क्या पलट कर देखें कुछ छूटा क्या होनी अनहोनी के बीच सदा उठती रहेगी एक टिश सदा टिशों से अपनापन छूटा क्या पलट कर देखें कुछ छूटा क्या जीवन सफर जारी सदा रहेगा अपनी बातें किससे तू कहेगा देखे अपना भी कोई रूठा क्या पलट कर देखें कुछ छूटा क्या परिचय :- प्रमेशदीप मानिकपुरी पिता : श्री लीलूदास मानिकपुरी जन्म : २५/११/१९७८ निवासी : आमाचानी पोस्ट- भोथीडीह जिला- धमतरी (छतीसगढ़) संप्रति : शिक्षक शिक्षा : बी.एस.सी.(बायो),एम ए अंग्रेजी, ड...
आत्म भीति
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आत्म भीति

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** कुछ लोग संतुष्ट हैं बस अपने ही अहम से न कि दूसरों की विनम्रता से। कुछ लोग डरते बस सुनी-अनसुनी बातों से न कि दूसरों की हुकूमत से। कुछ लोग खोखले हैं बस अपने दर्प से न कि दूसरों की प्रभुता से। कुछ लोग खौफ में है बस अपनी आशंकाओ से न कि दूसरों की आधिपत्य से। कुछ लोग आशंकित है बस अपनी ही अवधारणाएँ से न कि दूसरों की संकल्पनाएँ से। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के स...
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भ्रास

हितेश्वर बर्मन 'चैतन्य' डंगनिया, सारंगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** जरुरी नहीं है कि सिर्फ काँटा ही तकलीफ दे काँटे का क्या है ? वो तो कभी न कभी निकल ही जाएगा। पर मैं मन में छुपे हुए, भ्रास को कैसे बाहर निकालूं ? जो यदि बाहर निकल गया, तो दूसरों को तीर की भांति चुभेगा। और यदि बाहर न निकला, तो मुझे भीतर ही भीतर सीना भेदकर गहरी ज़ख्म पहुँचायेगा। न किसी से कुछ कह सकूंगा न तो ज्यादा दिन गले अंदर रख सकूंगा ! ये भ्रास मुझे दीमक की तरह खायेगा। मैं मन ही मन जलकर खाक हो जाऊंगा ज़ुबान होते हुए भी बोल न पाऊंगा क्रोधाग्नि मे मेरा कलेजा जल जाएगा फिर भी बाहर से कुछ नज़र नहीं आयेगा। ये भ्रास मुझ पर ही वार करेगा गले से उतरकर सीने में, तीर की भांति जा चुभेगा मैं कुछ नहीं कर पाऊंगा ये मेरे ही जिस्म को ढाल बनायेगा। सोचता हूँ मन की भ्रास निकाल दूँ गले में अटके हुए को...
घायल बलिया कि हुंकार
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घायल बलिया कि हुंकार

अभिषेक मिश्रा चकिया, बलिया (उत्तरप्रदेश) ******************** घायल बलिया चीख रहा है चीख सुनाने मैं आया हूं, घायल बलिया के फटे हाल का रूप दिखाने आया हूं। मैं बलिया का शिक्षित समाज शिक्षा कि हाल बताने आया हूं, न बना है इंजीनियरिंग कॉलेज, न मेडिकल कॉलेज दिखता हैं, तब क्यों इस बलिया में टेक्नोलॉजी और एमबीबीएस डॉ. ढूंढता है। मैं बागी बलिया में मेडिकल व्यवस्था का स्थिति जानने आया हूं, सुनलों ए बलिया के वासी एक मरीज़ का दर्द बताने मै आया हूं। जब किसी का तबियत खराब हो कैसे पहुंचे हॉस्पिटल को, अस्पताल में व्यवस्था नहीं हैं रेफर करदे मऊ, बनारस को। पता चलता कि जान चली जाती मरीजों कि बीच रास्ते में, कहां से पहुंचे मरीज बेचारा इलाज कराने अपना बीएचयू में। यहां से आगे बढ़ जब निकला मैं बलिया शहर के सड़कों पे, तब जाकर मैं पहुंच गया बलिया के टाऊन हाल कि गलियों में। मैं बलिया के...
सर्वविद
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सर्वविद

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** मैं वो भी सुनता हूं जो तुम कहते हो मेरी पीठ के पीछे चुपके से फिर भी एक चुपी है, लबों पर क्योंकि आवरण है मेरे विशुद्धि पर अनाहत के मधुर स्वर का। मैं वह भी देखता हूं जो तुम औरों को दिखाना नहीं चाहते और खुद से कभी छिपाना नहीं चाहते, फिर भी एक निशब्दता है होठों पर क्योंकि आच्छादन है मेरे दशम द्वार पर सहस्त्रार की अखंड ज्योति का। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी : कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति : भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के सा...
जीभर जीकर जाना
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जीभर जीकर जाना

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* खाना-पीना सो जाना बात-बात पर रो जाना. क्या ये है कोई ज़िंदगी यूँ ही मायूस हो जाना. चार दिनों की पूँजी साँसें बेजा इन्हें मत कर जाना. अवसर यह मिला हुआ है इसको जीभर जीकर जाना. विधाता ने बड़े प्यार से धरती घूमन को भेजा है. कुँदन काया सुँदर माया देकर के तुम्हें सहेजा है. अंदर-बाहर भरा उजाला हम सबको राह सुझाते हैं. न जाने किस भरम बावले कोई राह तक न वे पाते हैं. जग जैसा है, वैसा ही है किसलिए है इससे डरना. अकारण न घटती घटना केवल कारण से है बचना. बस इतना है हाथ तुम्हारे खुद की सुधबुध है रखना. है ईश्वर तेरे ही भीतर बैठा जब जी चाहे कर मिलना. बिना विचारे अंधा हो कर काहे कदम उठावे तू प्यारे. खुली आँख से चलने वाला कभी न ठोकर खावे प्यारे. तन- जीवन- जान अभी है फिर क्यों तू घबराए जग...
अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस
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अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस

नील मणि मवाना रोड (मेरठ) ******************** संयुक्त परिवार सबका, सबके लिए वैश्विक आवाहन परिवार गौरव, सुरक्षा, एकता का पवित्र आलिंगन जीवन की पहली श्वास को गर्माहट भरा चुंबन हर आंसू का आश्रय गृह, विश्वास और रंजन सपनों को संस्कारों के पंखों की उड़ान का सृजन रिश्तों के स्नेहिल धागों में लिपटा प्यारा आचरण परिवार, समाज, संस्कृति, राष्ट्र प्रगति का जागरण समय, संवाद, समर्पण के महत्व का अनोखा मंच व सिंचन। परिचय :- नील मणि निवासी : राधा गार्डन, मवाना रोड, (मेरठ) घोषणा : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्र...
स्त्री तुम बुद्ध नहीं बन पाई
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स्त्री तुम बुद्ध नहीं बन पाई

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** बुद्ध बनना कितना सरल, कितना कठिन, किन्तु स्त्री तुम कभी बुद्ध नहीं बन पाई ! अनेक दायित्व निभाती, तिल तिल मरती, फिर भी सब क्यों त्याग नहीं पाई स्त्री बुद्ध नहीं बन पाई !! सारे रिश्तों को छोड़कर, सारे बंधन तोड़कर, कर्तव्य अपना भूलकर, क्यूँ नही जा पाई, स्त्री तुम बुद्ध नहीं बन पाई !! करोडों बार अपमानित हुई, बार बार प्रताडित हुई, उजली तुम्हरी चादर फिर भी भी दागदार हुई, स्त्री तुम क्यों बुद्ध नहीं बन पाई !! संसार को तुमने जन्म दिया, फिर भी मूढ़ कहलाई , ज्ञान-ध्यान-तप की खातिर, घर-आंगन क्यों छोड़ नहीं पाई, स्त्री तुम बुद्ध नहीं बन पाई !! यशोधरा बनी, सीता बनी द्रौपदी और अहिल्या भी सच-शांत की पूजनीय प्रतिमा होकर भी स्त्री तुम बुद्ध नहीं बन सकीं!! परिचय :- श्रीमती क...
खुशी-खुशी कह दो
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खुशी-खुशी कह दो

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** हां सोच समझकर होशो हवास में रह कर रहा हूं गलती, मैं नहीं कहूंगा कि नादान हूं, मुंह बांये खड़ी परिस्थितियों से हद दर्जे तक परेशान हूं, ये मेरा नाकारापन ही है जो कुछ भी नहीं दे पाया खुशियों के नाम पर, सोचने का समय नहीं मिला हो सकने वाले अंजाम पर, मगर खुशकिस्मत हूं सबका भरपूर साथ मिला, मानता हूं सबके त्याग को जो चाहकर भी नहीं किये गिला, मगर क्या करूं मजबूर हूं, परिवार को दे सकने वाले खुशियों से महरूम हूं, शायद मैं अभागा नहीं हूं, कसम से जिम्मेदारियों से भागा नहीं हूं, लेकिन वक्त को व्यवस्थित कर नहीं पा रहा हूं, कब कौन निकल जाए इस जहां से बात दिमाग में धर नहीं पा रहा हूं, मैं करता नहीं अत्यधिक आत्मविश्वास, मुझे भी नहीं है लंबे जीवन की आस, गलतियां सुधारने के लिए, नाकामी स्वीकारने के लिए, हू...
रणबाँकुरे आल्हा और ऊदल
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रणबाँकुरे आल्हा और ऊदल

अशोक कुमार यादव मुंगेली (छत्तीसगढ़) ******************** यदुवंशियों की सुनो कहानी, योद्धा यादव की वाणी में। युद्ध मैदान में शेर समान दहाड़े, आग लगा दे पानी में।। क्षत्रिय कुलभूषण रणबाँकुरे, न्याय प्रिय वीर पराक्रमी। शास्त्रज्ञानी और युद्ध कौशल में निपुण परम प्रतापी।। दक्षराज के महान सच्चा सपूत, आल्हा-ऊदल दो भाई। परमाल के वीर सेनापति, मैदान में बावन लड़ी लड़ाई।। महोबा के बनाफर अहीर, वीरता के लिए थे विख्यात। पूजा करते मैहर देवी की, अमरता का दिया आशीर्वाद।। बैरागढ़ के महायुद्ध में, वीर ऊदल वीरगति को प्राप्त हुई। आल्हा क्रोध में व्याकुल, प्रतिशोध लेने की कसम खाई।। उड़न पखेरु घोड़ा में बैठा, चतुरंगिणी सेना दलबल साजे। चमक उठी आल्हा की तलवार, युद्ध के लिए दुंदुभी बाजे।। गरजे आल्हा युद्ध मैदान में, शत्रु सैनिक डर कर भागे। एक को मारे दस मर जाय, मारते-मारते ...
जिसको लोग आम कहते हैं
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जिसको लोग आम कहते हैं

अंजनी कुमार चतुर्वेदी "श्रीकांत" निवाड़ी (मध्य प्रदेश) ******************** जिसको लोग आम कहते हैं, वही खास होता है। जिसको नहीं मिले खाने को, वो आपा खोता है। पके रसीले आम देखकर, मुँह में पानी आता। बच्चे युवा वयस्क आम को, हर कोई है खाता। कोई इसे चूसता मुँह से, मन प्रसन्न हो जाता। इसको बिना दाँत का बुड्ढा, बड़े प्यार से खाता। आता आम हाथ बच्चों के, पहले झगड़ा होता। पाने वाला खुश हो जाता, नहीं मिले वो रोता। बच्चे इसे प्यार से खाते, खाते और गिराते। जिसको नहीं मिला उसको वे, लंबी जीभ चिढ़ाते। सभी आम के दीवाने हैं, बड़े स्वाद से खाते। कलमी लँगड़ा और दशहरी, बदामी घर लाते। पका रसीला आम हाथ से, जब बच्चे खाते हैं। आधा रस हाथों में लगता, वस्त्र भीग जाते हैं। जैसा मजा मिला बचपन में, वैसा कभी न पाया। खा लो आम सभी जी भर कर, आम रसीला आया। परिचय :- अंजनी ...
मैं पंछी तेरे आंगन की
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मैं पंछी तेरे आंगन की

अभिषेक मिश्रा चकिया, बलिया (उत्तरप्रदेश) ******************** मैं पंछी तेरे आंगन की, तूने उड़ना सिखाया था। तेरे प्यार की छांव तले, बचपन हँसना सिखाया था। फिर आया दिन वो सांझ भरा, जब विदाई का वक्त था अश्रु धरा। कांपते पाँव, मुस्काती आँखें, दिल के भीतर सिसकती साँसें। डोली में बैठी थी ख़ामोशी सी, हर हँसी के नीचे थी एक उदासी सी। पीछे छूटा वो कंचों का खेल, सामने था अब जीवन का रेल। ससुराल की देहरी पर रखे पाँव, पीछे छूटा हँसी का गाँव। चेहरे नए, रिश्ते भी अनजान, दिल बोले- “क्या यही है पहचान?” भाई की चिढ़, माँ की डाँट, सब अब मीठी लगती है। वो रोटियों की छोटी बातें, अब आँखों से बरसती हैं। तू कहता था- उड़ जा बेटी, सपनों का कोई घर होगा। क्या जानती थी ये उड़ान, इतनी भारी सफर होगा। माँ से लड़कर मैं चली आई, सास की बातें अब क्या कहूँ? कभी बेटी थी, अब बहू हूं, कभी अप...
जिंदगी का सफर
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जिंदगी का सफर

आनंद कुमार पांडेय बलिया (उत्तर प्रदेश) ******************** जिंदगी का सफर यूं बदल जाएगा, मैं न सोचा ये मौका निकल जाएगा। रंजिशें तोड़ दो छोड़ दो ख्वाहिशें, क्या पता साथ क्या तेरे कल जाएगा। जो है किस्मत में मिलकर रहेगा तुम्हें, दुख का सूरज तुम्हारा भी ढल जाएगा। कायरों की तरह जी के क्या फायदा, तेरा जीवन जहां से अटल जाएगा। डर के कांटो से पीछे न मुड़ना कभी, वक्त का ये परिंदा चपल जाएगा। ढलते रजनी हीं आता सवेरा नया, गिरने वाला भी इक दिन संभल जाएगा। चंद पल तो तु आनंद के साथ जी, तेरे संग ना जुटाया ये दल जाएगा। परिचय :- आनंद कुमार पांडेय पिता : स्व. वशिष्ठ मुनि पांडेय माता : श्रीमती राजकिशोरी देवी जन्मतिथि : ३०/१०/१९९४ निवासी : जनपद- बलिया (उत्तर प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। ...
माँ ही क्यों लिखूँ?
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माँ ही क्यों लिखूँ?

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** एक बड़ा सवाल मैं माँ ही क्यों लिखूँ? क्या सिर्फ इसलिए कि उसने मुझे अपने गर्भ में प्रश्रय दिया, रक्त मज्जा से मुझे आकार दिया, दिन रात मेरा बोझ नौ माह तक ढोया या फिर इसलिए कि मुझे जन्म देने के लिए खुद को दाँव पर लगा दिया। या फिर अपना दूध पिलाया, खुद गीले में सोई, मुझे सूखे में सुलाया, हर पल मेरे लिए सचेत रही या फिर इसलिए कि मेरी खातिर अपने सारे दुःख दर्द भूली रही, अपनी ख्वाहिशें होम करती रही। पाल पोस्टर बड़ा किया। या फिर इसलिए कि माँ है हमारी जो मेरे हंँसनें पर हँसती रही मेरे रोने पर रोती रही, मेरी छोटी सी खुशी के लिए अपनी बड़ी से बड़ी खुशी भी पीछे ढकेल देती अपना सब कुछ भूली रहती। या फिर इसलिए कि मैं उसका सिर्फ अंश नहीं उसका ही निर्माण हूँ, वो पहाड़, मैं उसका मात्र रजकण हूँ। या फिर इसलिए क...
आतंकवाद के विरुद्ध निर्णायक युद्ध
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आतंकवाद के विरुद्ध निर्णायक युद्ध

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** पहलगाम में हुआ है भयंकर नर संहार। अब हमें करना होगा आतंकवाद पर प्रहार। ******** धर्म की आड़ में खून खराबा हुआ है। इसमें बहुत सारे लोगो का लहू बहा है। ******** अब हम आतंकियों को चुन चुन कर मारेंगे। एक एक को धरती में जिंदा गाड़ेंगे। ******* ऐसी देंगे सजा की आतंकियों की रूह कांप जायेगी। फिर किसी आतंकवादी की हिम्मत नहीं हो पायेगी। ******* आतंकियों को मुंह तोड़ जवाब देना होगा। उनको बिल से बाहर निकाल कर मारना होगा। ******** इस बार आतंकियों का ऐसा करे हम हाल, कि उनकी आत्म कांप जाय। और भविष्य में कोई नया आतंकवादी न बन पाय। ********* आतंकवाद मानवता के विरुद्ध एक भयंकर अपराध है। इसका खात्मा जरूरी है क्योंकि इसमें मरते निर अपराध है। ******** परिचय : डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" निवासी : चिनार...
क्यों कोई
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क्यों कोई

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** क्यों कोई साथ आता है बीच राह मे आकर छोड़ जाता है क्यों क्यों कोई दया दिखाता है और मुंह मोड़ लेता है आखिर क्यों क्यों कोई सान्त्व्ना देता है दुख मे दो शब्द बोल कर। क्यों क्यों कोई याद करते-करते भूल जाता है अपने स्वार्थ के लिए क्यों कोई अपनी छाया से डरता है अतीत के कर्मो के कारण क्यों कोई हवा मे फरफराती एक लौ को हथेली से ढकता है क्यों प्रकाश के लिए न। ये सब बुद्धिजीवी मानव की प्रेम, घृणा, स्वार्थ, भय, वात्सल्य, आन्नद, जैसे वीर रस की पहचान देते साथी है जो क्या का उत्तर देते है। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ स...
यहाँ‌ वहाँ खेतों में
कविता

यहाँ‌ वहाँ खेतों में

बृजेश आनन्द राय जौनपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** यहाँ‌ वहाँ खेतों में कटे बिछे गेहूँ पर गिरती है चाँदनी अभ्र रहित अंबर है गोरी है, चैता है टूटा हुआ उर है मन में उतरे जो बिरहन का स्वर है बिखरे हुए बोझ जैसे बैठे हुए- 'बादल' हैं छोड़ कर आएँ जो अंबर का आँचल हैं अभी न बरसने का एक एक वादा है खलिहानी पहुंँचने का पक्का इरादा है। परिचय :-  बृजेश आनन्द राय निवासी : जौनपुर (उत्तर प्रदेश) सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर म.प्र.द्वारा शिक्षा शिरोमणि सम्मान २०२३ से सम्मानित घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहा...
ऑपरेशन सिंदूर
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ऑपरेशन सिंदूर

किरण पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** ऑपरेशन सिंदूर का हो गया श्री गणेश, पाक हिंदुस्तान का शुरू हो गया है खेल, छेड़ा है तो छोड़ेंगे नहीं भारत का है मंत्र, चुन-चुन कर हम बदला लेंगे मोदी का है मंत्र, आतंक और राजनीति चक्की के दो पाट पिसा रही है जनता सारी कसूरवार सब भाग, खूब सहा इन आतताईयो को आये नही ये बाज, अपने सामने बुला रहे है मौत को यजमान, सुता साँप जगाया इसने (पाक) अब फुँकार संभाल, चुन-चुनकर मारेगे इनको हर कोना है छान। ताकत नही है कुछ करने की बडी़ बडी़ है बात, पर्वत (भारत) से टकराओगे चूर-चूर हो माथ। परिचय : किरण पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मित्र मंडल जबलपुर से सम्मानित २. अंतर्राष्ट...
फिर वही बात
कविता

फिर वही बात

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** बहुत भुलाना चाहा, पर इनकी पीड़ा से मुक्ति की कल्पना, मुझे फिर उन्हीं अंधेरी गलियों में ले जाती है, जहाँ फिर से वही बातें दोहराई जाती हैं, फिर से वही क्रूरता का ताना बाना बुना जाता है, फिर वही निर्दयता पूर्ण व्यवहार की बातों का सिलसिला चलता है ! इनकी मासूमियत वहां एक बार फिर फ़ना हो जाती है ! फिर इनके लिए वही बेबसी, वही लाचारी, जिनमे ये मासूम रात-दिन दम तोड़ते हैं ! उस अंधकार में कोई रोशनी की किरन नहीं दिखती, कोई ऐसी ध्वनि कानो में नहीं पड़ती, जिसमें इनकी मासूमियत की बातें हों, जिनमे इनके लिए करुणा और ममता हो ! यहां बार बार वही गलतियाँ दोहराई जाती हैं, इन मासूमों के जीवन को संरक्षित करने की आशा क्षीण होती जाती है,! इंसानो की नगरी में मानो इंसान विवेकहीन हो गया है, स्वयं के लिए...
बौना हुआ ईमान
कविता

बौना हुआ ईमान

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* सारी दुनिया वह कहे जो सम्मत विज्ञान धरती -चपटी मानते अभी बहुत इंसान। अड़े हुए हैं झूठ पर जान -बूझ अंजान अंध-श्रद्धा के सामने बौना हुआ ईमान। इंसाँ -इंंसाँ फर्क कर मज़हब लीने मान कुछ लोगों को छोड़कर सब काफिर शैतान। काफ़िर का जायज़ क़तल क्या यही कहता ज्ञान काफ़िर का कर खात्मा हासिल करो जहान। जो धरती पैदा हुआ वो सब एक समान यहाँ सभी हकदार हैं जीव -जंतु -इंसान। प्रेम -मुहब्बत -मुरब्बत इंसानी पहचान जिस मज़हब ये न रहें वो मज़हब मुर्दा जान। कुछ लोगों को वहम का होने लगा गुमान जो जितना जाहिल दिखे वो मज़हब की शान। परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरवरी निवासी : पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्व...
पहलगाम में आतंकी हमला
कविता

पहलगाम में आतंकी हमला

डॉ. किरन अवस्थी मिनियापोलिसम (अमेरिका) ******************** बस पर आतंकी ‌हमला घर पर आतंकी ‌हमला कभी गोली औ बम बरसाकर सड़कों पर पत्थर बरसाकर रेल की पटरी उखाड़ उनपर भारी पत्थर रखकर भारी चीजें अटका कर, आग लगाकर पर्व, जलूसों, सेना पर पत्थर बरसाकर मासूम, निहत्थे टूरिस्टों पर गोली चलवाकर सारे जग‌को कर‌आतंकित खुद लुके छुपे फिरते हैं यह कायर बड़े हुआ करते हैं आतंकी यही हुआ करते हैं। कबतक भारत आतंक सहेगा कबतक भारतपुत्र शहीद बनेगा अब और नहीं हम सह सकते उनका आतंकी मकसद होकर चकनाचूर रहेगा। भारत ने न कभी पहला वार किया कई बार तुम्हें छोडा माफ़ तुम्हें कई बार किया। तुमने अति कर दी आतंकी दल बहुत सहा है हमने उत्तर मुंहतोड मिलेगा इनकी कायरता को सारा जग देखेगा। घर में घुसकर मारेंगे सब तहस नहस कर देंगे भारत की मर्यादा को लांघा आतंकिस्तान न बचने देंगे। जय भारत क...
बदलाव
कविता

बदलाव

नील मणि मवाना रोड, (मेरठ) ******************** किसी को बदलने की कोशिश कभी नहीं करनी चाहिए हां अगर चाहें तो कोशिश करें स्वयं में कुछ परिवर्तन जरूर ला सकते हैं दूसरों के अनुकूल स्वयं को बना सकते हैं स्थिति में संतुलन बैठ सकते हैं दो विपरीत दिशाओं को मिला सकते हैं कोशिश जरूर करनी चाहिए बंधने में ही सार्थकता है टूटना अंतहीन है, दुखद है अपने लिए तो सभी जीते हैं किसी और के लिए भी जी कर देखना चाहिए। परिचय :- नील मणि निवासी : राधा गार्डन, मवाना रोड, (मेरठ) घोषणा : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि ...
सुधास्तवनम्
कविता

सुधास्तवनम्

भारमल गर्ग "विलक्षण" जालोर (राजस्थान) ******************** हे अंबिके! तुम्हीं वह प्राणप्रतिष्ठा हो सनातनी, शब्दब्रह्म का नाद जिसमें, वही स्वर हो। सहस्र के कमल में विराजित चित्र की ज्योति, महाकाल के उत्सवों से टपकी अमृत-बूंद रानी हो॥ युग-युग अनुवाद के पवित्र शिलालेख पर, त्रिगुणातीत गगन की व्योमस्थ महिमा-निधानी हो। प्रलय के मौन में भी जो गूंजे ॐ का मधुर-स्वर, वह निर्वाण की वीणा के अधिष्ठान की हो॥ मृत्युंजय के हस्त से रची पंचभूत की रंगभूमि, अखण्ड मण्डलाकार में ब्रह्माण्ड का क्षणिक खिलौना हो। विराट का सम्पुटित रहस्य, अनाहत नाद सा अनंत, पर मूक अभिनव कल्पित हो॥ कालचक्र के दन्तों में राक्षसी नश्वरता को चिर, अक्षय पात्र के लिए स्टेक ध्रुवतारा-सी अडिग धुरिणी हो। अम्बर में हड्डी वाली कृषिका, सृष्टि के हर कण में सनातन का स्पंदन तुम्हीं हो॥ शून्य के सागर में डूबे अत्या...