सपने में स्वप्न देखती हूँ
श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
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सपने में स्वप्न देखती हूँ,
एक दृश्य जिसमें पीड़ा,
घुटन और विरक्ति,
कहीं कहीं उन्माद है,
गहरी खामोशी है !
मैं मेरे विचारों
से टकरा रही हूँ !
सपने में जो भी साथ दे,
मैं खुद को उसका
आभारी समझूँगी,
सपनों का विचारों का
द्वंद बढ़ता जा रहा है,
फिर भी मैं भयभीत नहीं हूँ,
हारी नहीं हूँ !
किसी प्रकाश की चाहत है,
मुझे खोने का,
टूटने डर नहीं है !
अचानक सपने में
उम्मीद की किरन
से भर उठती हूँ,
एक प्रार्थना के शब्द
कानो में फुसफुसा रहे है,
क्यूँ स्वयं के अस्तित्व
को गले लगाना
मोह में उलझना,
अचानक जाग जाती हूँ,
पुनः विचारों में
उलझ जाती हूँ,
स्वयं से प्रश्न पूछती हूँ,
ये स्वप्न था या
कोई दुःस्वप्न
क्या है ये स्वयं
का अस्तित्व,
क्या है मोह??
स्वप्न अधूरा है,
या अर्थ?
सोच को दृढ़ ...


















