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कविता

उनको जब यह अहम हो गया हो गया
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उनको जब यह अहम हो गया हो गया

अरविन्द सिंह गौर इंदौर (मध्यप्रदेश) ******************** यह उनको जब यह अहम हो गया हो गया, हर कार्य होगा उनसे ही उनको यह बहम हो गया। मुर्गे के बाग देने के पहले ही भोर का सूर्य उदय हो गया।। यह उनको जब यह अहम हो गया हो गया। हर कार्य होगा उनसे ही उनको यह बहम हो गया। हर कार्य सफल होता है सब के सहयोग से वर्चस्व की लड़ाई से बना बनाया काम विफल हो गया।। यह उनको जब यह अहम हो गया हो गया, काम उनसे ‌ही होगा उनको यह बहम हो गया। कहे "अरविंद" सबका साथ-सबका सहयोग होगा तो आपका हर काम सफल हो गया। यह उनको जब यह अहम हो गया हो गया, काम उनसे ‌ही होगा उनको यह बहम हो गया। परिचय :-  अरविन्द सिंह गौर जन्म तिथि : १७ सितम्बर १९७९ निवासी : इंदौर (मध्यप्रदेश) लेखन विधा : कविता, शायरी व समसामयिक सम्प्रति : वाणिज्य कर इंदौर संभाग सहायक ग्रेड तीन के पद में कार्यरत घोषणा पत्र :...
जरा होश में तो आओ
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जरा होश में तो आओ

डोमन निषाद डेविल डुंडा, बेमेतरा (छत्तीसगढ़) ******************** रिश्वत का बजार क्यों है? हमें कोई कारण बताओ। कारण खुद के अंदर है, रिश्वत में ताला लगाओ। अधिकार का नारे बहुत हैं, हमें कोई कारण बताओ। कारण खुद के अंदर है, संविधान के पाठ पढा़ओ। भ्रूण हत्या क्यों हो रहे हैं, हमें कोई कारण बताओ। कारण खुद के अंदर हैं, बेटी को सम्मान दिलाओ। ये गरीबी कारण क्या है? हमें तो कारण बताओ। कारण खुद के अंदर हैं, शिक्षा की ज्योति जलाओ। हम दुःखी क्यों रहते हैं, हमें कोई कारण बताओ। कारण खुद के अंदर है, जरा होश में तो आओ। परिचय :- डोमन निषाद डेविल निवासी : डुंडा जिला बेमेतरा (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छा...
गौरी की रक्षा…
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गौरी की रक्षा…

मानाराम राठौड़ जालौर (राजस्थान) ******************** किसानों का यह असली साथी हर फुर्सत है इसके उपयोगी पीते हम गोरी का गोरस शरीर अपना बनाते मक्खन, छाछ, दही जैसे और कई मिठाइयां हम खाते गोबर से खाद बनता उपयोग इसका खेत में होता हरि घास से ये खाती है सूखे खाने में रह लेती है कभी न कोई इसकी शिकायत होती हर पल, हर समय यह शांत रहती ग्रामों में लोग शौक से पालते शहरों में इसके लिए कोई घर नहीं गौशाला का निर्माण करवाओ माता रूपी गाय की सेवा करो और तुम रक्षा करो परिचय :- मानाराम राठौड़ निवासी : आखराड रानीवाड़ा जालौर (राजस्थान) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, रा...
सुख और दुख
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सुख और दुख

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** अनुभव और ज्ञान मनुष्य के सुख दुख का कारण है, अब बताइए इसका क्या निवारण है, बंदर को कह दो हाथी, दुखी नहीं होगा उनका कोई साथी, हाथी को कह दो गधा, बिगड़ेगा नहीं चाल रहेगा सधा का सधा, शेर को कह दो सियार, नहीं बदलेगा वो खूंखार, खरगोश को कह दो चीता वो घास ही खायेगा, नहीं कोई खुशी मनाएगा, इन सारे जानवरों को बिल्कुल नहीं पता उनका नाम क्या है, पर इतना जरूर जानते हैं कि उनका काम क्या है, किसी को अपना नाम ज्ञात नहीं, नाम तो इंसानों की देन है, अपने अनुसार खेलता मानवी गेम है, ज्ञान और अनुभव के बिना वो अपनी दुनिया में खुश है, मगर सब कुछ जान कर मोह माया, स्वार्थ में डूबा आदमी नाखुश है, हर जीव जंतु अपने काम से जाने जाते हैं, केवल मनुष्य ही है जो नाम से जाने जाते हैं, तो मनुष्यों दुखी हो जाओ या सुख...
हे राम जी! मेरी गुहार सुनो
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हे राम जी! मेरी गुहार सुनो

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** हे राम जी! मेरी पुकार सुनो एक बार फिर धरा पर आ जाओ धनुष उठाओ प्रत्यंचा चढ़ाओ कलयुग के अपराधियों आतताइयों, भ्रष्टाचारियों पर एक बार फिर से प्रहार करो। उस जमाने में एक ही रावण और उसका ही कुनबा था जो कुल, वंश भी राक्षस का था फिर भी अपने उसूलों पर अडिग था, पर आज तो जहां-तहां रावण ही रावण घूम रहे हैं जाने कितने रावण के कुनबे फलते-फूलते वातावरण दूषित कर रहे हैं। इंसानी आवरण में जाने कितने राक्षस बहुरुपिए बन धरा पर आज स्वच्छंद विचरण कर रहे हैं समाज सेवा का दंभ भर रहे हैं सिद्धांतों की दुहाई गला फाड़कर दे रहे हैं भ्रष्टाचार, अनाचार अत्याचार ही नहीं दंगा फसाद भी खुशी से कर रहे हैं दहशत का जगह-जगह बाजार सजा रहे हैं। जाति धर्म की आड़ में अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं अकूत धन संपत्ति से ...
नारी शक्ति
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नारी शक्ति

कुंदन पांडेय रीवा (मध्य प्रदेश) ******************** युग कोई भी आ जाए, क्यों नारी छली ही जाती है। कभी सिया कभी मीरा राधा, बन वह कष्ट उठाती है। अग्नि परीक्षा देकर भी, क्यों वन को भेजी जाती है। कभी सिया कभी मीरा राधा बन वो कष्ट उठाती है। अब तो रघुवर आ जाओ, सीता का कष्ट मिटा जाओ। उस युग में ना सही मगर, इस युग में न्याय दिला जाओ। विरह कलह सतवार सहन कर, हरगिज़ ना अकुल आती है। प्रचंड ज्वार हर बार प्रहार को, छलनी करती जाती है। कभी सिया कभी मीरा राधा, बन वह कष्ट उठाते हैं। परिचय :-  कुंदन पांडेय निवासी : रीवा (मध्य प्रदेश) उद्घोषणा : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र ...
बसन्ती महक उठी
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बसन्ती महक उठी

बृजेश आनन्द राय जौनपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** बासन्ती, महक उठी ! चंचल-प्रकृति-बीच- कोयल बहक उठी ! गुलमोहर की डालों-पे गिलहरी-लहराई ! अढ़उल की शाखों पे- गौरैया-शरमाई ! सेमल-पलास बीच दिशाऍ लहक उठी ! पीपल पे हरी-हरी बदली छिटक उठी...! पाकड़ पे 'उजास' फूटा, बरगद पे ठिठका ! मौसम का ठौर-ठौर वृक्षों पे अटका ! महुआ के गुंचो में रसना समा रही ! अमरइया की मंजरी- किसको न भा रही ! मोरों को लय-ताल तीतर समझा रहा.. कपोत कुछ आगे फिर- पीछे-को जा रहा.. ! नीम के कोतड़ में तोते आनन्द-भरें... कठफोड़वा के श्रम पे ना जरा भी गौर करें..! जामुन के फूलों पे- भवरी-लहराई ! छींट-सारी पहनाई! शिरीष की शाखों-पे कर्णफूल लटक रहे ! अमलताश अब भी- पीताभ को तरस रहे! अर्जुन ने देखो, नव-किसलय है पाया! गूलर का फूल कहॉ सबको नजर आया! अन्दर ही अन्दर 'प्रकृति', रचना अप...
निर्बल संगम
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निर्बल संगम

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** व्यक्ति व्यक्ति का निर्बल संगम कर रहा मानवता को कायर बोल रही आज अमानवता कर रहे मानवता में दानवता। सत्य, स्फुरति, स्पंदन उड़ गया मानवता से जागे आज अनेक रावण करवाते नित नए क्रंदन एक पुरुष का पौरूष जागे करें क्या एक अकेला। इस नर्तन में। रक्त देख रक्त खोलता था शिराएं थी तन जाती। वर्तमनु, मनुष्य नहीं है मांगना केवल अपनी ख्याति में। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती है...
शत शत नमन सभी माँओं को
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शत शत नमन सभी माँओं को

अंजनी कुमार चतुर्वेदी निवाड़ी (मध्य प्रदेश) ******************** तीनों माँयें पूजनीय हैं, जिननें ऐसे लाल जने। हुए शहीद युवावस्था में, पर भारत की ढाल बने। वैदेही वन गमन हुआ जब, तब जन-जन रोया था, धैर्य देख लो उन माँओं का, जिनका सुत खोया था। धन्य धरा है, धन्य देश है, जिसमें थे तीनों जनमें। हैं सतवार धन्य माताएं, निज सुत भेजे थे रण में। भगत सिंह सुखदेव राजगुरु, तीनों की थी तरुणाई। भारत माता की रक्षा हित, ली,तीनों ने अँगड़ाई। खट्टे दाँत किये दुश्मन के, कोई पास न आता था। हर अँग्रेजी सैनिक डर से, नाकों चने चबाता था। सिंह गर्जना सुन तीनों की, गोरे भी थर्राते थे। चाँद सितारे भरी दोपहर, नजर उन्हें भी आते थे। भीषण अत्याचार किया था, गोरों ने ही झाँसी पर। माँ का फटा कलेजा होगा, लाल चढ़े जब फाँसी पर। चूमा था तीनों ने फंदा, हो बुलंद हँसते-हँसते। जैसे शाही ...
सबको हंसा दो
कविता

सबको हंसा दो

सीमा रंगा "इन्द्रा" जींद (हरियाणा) ******************** सबका जीवन भरा कष्टों से पर हंसकर पार करो तुम माना धन की कमी है सभी को पर दिल से रहीश बनो तुम । आज अकेले कर परिश्रम दिखा दो ताकत सभी को तुम । करके जरूरतें कम अपनी खुशियों को बढ़ा लो तुम । आज पैदल कल साइकिल से चल गाड़ी में बैठ जाना एक दिन तुम बड़ों का आदर छोटों से प्यार सबके दिलों पर राज करो तुम गम में होके सरीक सभी के दुखों को कम कर दो ना तुम मुरझाए चेहरे हैं चारों तरफ बोल मीठे बोल खिलखिला दो तुम अपनी चाहतों को फैला कर रोते को सीमा हंसा दो ना तुम परिचय :-  सीमा रंगा "इन्द्रा" निवासी :  जींद (हरियाणा) विशेष : लेखिका कवयित्री व समाजसेविका, कोरोना काल में कविताओं के माध्यम से लोगों टीकाकरण के लिए, बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ हेतु प्रचार, रक्तदान शिविर में भाग लिया। उपलब्धियां : गोल्डन बुक ऑफ वर्ल...
माँ  कृपा
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माँ कृपा

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** माँ कृपा बड़ी निराली है करो समर्पण फिर जिंदगी में खुशहाली है भले ही माँ भूखी रह जाती है मुझे आई तृप्ति की डकार से माँ संतुष्ट हो जाती है। संसार में माँ ही शक्तिशाली है बिन माँ के दुनिया की बदहाली है माँ रातो को लोरिया सुनाती है नींद में मीठे सपनो को बुलाती है। कभी नींद में हँसाती गालो में गड्डे बनाती है जब जब माँ की याद आती है सुबह मीठी आवाज में उठाती है। माथे को चुम कर बालो को सहलाती है स्वर्ग धरा पर बनाती है माँ का कृपा बड़ी निराली है करो समर्पण फिर जिंदगी में खुशहाली है। परिचय :- संजय वर्मा "दॄष्टि" पिता :- श्री शांतीलालजी वर्मा जन्म तिथि :- २ मई १९६२ (उज्जैन) शिक्षा :- आय टी आय व्यवसाय :- ड़ी एम (जल संसाधन विभाग) प्रकाशन :- देश-विदेश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ व समाचार पत्रों में निर...
माँ भारती शर्मसार हो गई
कविता

माँ भारती शर्मसार हो गई

सरला मेहता इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** पाशविक दहलाती करतूतें हदों से ही गुज़र गई दरिंदों की दारुण बेहयाई अब सीमा पार हो गई नैतिक मूल्यों की वो बातें कहाँ बिखर बिसर गई अमानवि दुःशासिनी हरकतें अब तो कारगार हो गई देवियों से पूजित बेटियों की चुनरी क्यूँ तार तार हो गई ये मासूम अधखिली कलियाँ अब दर्द से बेज़ार हो गई नोची खसोटी गई कई गोरियाँ अनब्याही ही आज रह गई ख़्वाबों की सुरमई गलियों से बदनाम बस्तियाँ बन गई शिवानी एलीना आसिफ़ा सी निर्भया दामिनी चली गई हाथरस में मनीषा की हड्डियां हथौड़े से चूर चूर हो गई ना रहा भय महामारी का इन्हें दुर्दांत कहानी मशहूर हो गई रक्तरंजित गूंज रही कराहों से यम- ड्योढ़ी तरबतर हो गई लक्ष्मी दुर्गा पद्मिनी के देश में माँ भारती शर्मसार हो गई परिचय : सरला मेहता निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती ह...
नारी का समर्पण
कविता

नारी का समर्पण

संगीता सूर्यप्रकाश मुरसेनिया भोपाल (मध्यप्रदेश) ******************** देखो-देखो नारी समर्पण, इस जग में सबसे न्यारा और प्यारा। इतिहास भी साक्षी है, हर नारी बोले, हर पुरुष नारी तोले, बिन बात पति बोले, पत्नी से हौले-हौले, तुम सारा दिन करती ही क्या हो ? प्रश्न सुन पत्नी का क्रोध खौलें, पत्नी कहे मत दिखाओ, नयनों के गोले, तुम कितने हो भोले, ऐसी कटु वाणी से रिश्ते हो जाते पोले। तुम सब पुरुष पहन लो मानवता के चोल़े, हर्ष से भर लो अपने-अपने झोले। जीवन नैया तुम्हारी क्यों डोले ? यह जानो और समझो। तुम बजाओ शहनाई, और सुंदर जीवन संगीत के ढोलक-ढोले। अपने-अपने अंतस भरे अहंकार कालिमा धौले। हटाओ घृणा, द्वेष, ईर्ष्या के फफोले। समझो नारी समर्पण का मोल, भस्म करो पंच विकार ज्ञान यज्ञों की अग्नि में, मत करो नारी से अति अपेक्षा का लोभ। अब जान भी जाओ और मान भी जाओ। न...
नव वर्ष संकल्प करें
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नव वर्ष संकल्प करें

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** आओ इस नववर्ष संकल्प करें बीते कल का आभार करें, नव संवत्सर का सत्कार करें उज्जवल भविष्य की सोच लिए अपनी मंजिल की ओर बढ़ें तमस मिटा अंतर्मन का, हर भेद भाव को दूर करें नई उमंग नई चाह लिए जीवन में नया प्रवाह भरें भूल गए जिन कर्तव्यों को संपूर्ण उन्हें इस वर्ष करें हर जीव को सम्मान मिले, जीने का अधिकार मिले, हर चेहरे पर मुस्कान खिले, हौसला ये रख हर कदम बढ़ें क्यों भूल गया मानव इनको, धरती माता के लाल हैं ये निर्बल, असहाय, कमजोर मगर ईश्वर का प्रतिरूप हैं ये ले दृढ़ प्रतिज्ञ इनके हक़ में इनका मार्ग प्रशस्त बनाना है सृष्टि के उपहार हैं ये इसका कर्ज चुकाना है ये धरा-गगन कल कल नदियां, हर जीवन का आधार हैं ये वन का मूल्य पहचान हमें इनका अस्तित्व बचाना है ले प्रण हर जीवन के संरक्षण का धरती का सौंदर...
ये ख्वाब हमारे
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ये ख्वाब हमारे

किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया (महाराष्ट्र) ******************** जब देश की आजादी के १०० वर्ष पूरे होंगे आजादी के अमृत काल तक भारतीय शिक्षा नीति सारी दुनिया को दिशा देने वाले दिन होंगे ये ख्वाब हमारे संकल्प सामर्थ्य से पूरे होंगे अमृत काल में हिंदुस्तान की शिक्षा नीति की विश्व प्रशंसा करे, यहां ज्ञान लेने आएं, ऐसा हमारा गौरव हों, विश्व कल्याण की भूमिका निर्वहन करने में भारत समर्थ होंगे राष्ट्रीय शिक्षा नीति को शिक्षकों प्रशासकों ने गंभीरता से अमल में लाना है शिक्षा क्षेत्र में भारत को विश्वगुरु बनाना है भारतीय युवाओं में प्रतिभा की कोई कमी नहीं बस गंभीरता से उसे पहचानना है शिक्षण को स्वांदात्मक बहुआयामी आनंदमयी अनुभव बनाना है छात्रों में मूल्यों को विकसित करने शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका रेखांकित करनाहै छात्रों के आचरण को सुधारने विपरीत परिस्थितियों का स...
राम आते हैं
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राम आते हैं

रेणु अग्रवाल बरगढ़ (उड़ीसा) ******************** युग-युग में आकर सदा अपना वचन निभाते हैं हर अहिल्या को तारने एक राम ही आते हैं। सदियों से हो सिलारूप असह्य वेदना भोग रही कब आएँगे वो तारनहार आतुर नैनों से जोग रही स्नेह स्पर्श देकर अपना उसकी व्यथा मिटाते हैं। हर अहिल्या....। पुरुष तत्व रहा दंभ भरा नारी को न स्वीकार पाया बदला था न बदलेगा कभी अहं विरासत उसने पाया अहं का मर्दन करते हैं वो पुरुषोत्तम राम कहलाते है हर अहिल्या को....। नारी पावन होकर भी देती रही अग्नि परीक्षा पुरुष प्रधान समाज ने कब जानी उसकी इच्छा हर सीता के आँचल में क्यों सदा काँटे आते हैं हर अहिल्या...। प्रेम आड़ में छलता जो स्त्री के कोमल मन को क्या पाएगा आत्मा को छूकर रह गया तन को प्रेम शक्ति की सत्ता की वो अनुभूति कराते हैं हर अहिल्या....। परिचय :-  रेणु अग्रवाल निवासी - बरगढ़ (उड़ीसा)...
पानी
कविता

पानी

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** रे बाबा कैसी जिंदगानी है, पानी की भी अजब कहानी है, पानी से ही धोना नहाना, पानी से ही पीना खाना, नहीं करती कभी ओछी हरकत, पानी निःस्वार्थ देती है कुदरत, पर कुछ जातियों में जबरदस्त शक्तियां देखी जाती है जो अन्न को, जल को, यहां तक भगवान को भी अपवित्र कर देते हैं, कइयों की भावनाएं आहत कर उनमें मातम भर देते हैं, इनके आगे कोई नहीं ठहरता, पता नहीं कौन है इनमें शक्ति भरता, सुअर, कुत्ते, बैल जैसे जानवर भी किसी घाट, जलाशय को अपवित्र नहीं कर सकते, पर वाह रे अमानवीय नियम कुछ मानव पानी में अपना पांव नहीं धर सकते, मगर धन्य है वो महामानव, जिसने मनुवादियों के सामने पानी छूने से लेकर पीने तक का अधिकार दिलाया, लोगों को पानी पिलाया, रोते रहें वे जो रहते हैं हरदम रोते, लेकिन इतना जरूर जान लें पानी और खून कभी अ...
अबे ओ काले घन!
कविता

अबे ओ काले घन!

शैल यादव लतीफपुर कोरांव (प्रयागराज) ******************** अबे ओ काले घन! क्यों बना रहे हो हमें और भी निर्धन, पेशे से ‌भले ही मैं 'किसान' हूॅं, लेकिन यार मैं भी तो एक इंसान हूॅं, नहीं मिलती किसी भी प्रकार की हमको पेंशन है, दिन-रात,सुबह-शाम, आठों पहर केवल टेंशन है, चैत माह में जब रबी की फसल तैयार है, फिर बूॅंदों की तलवारों और ओलों से क्यों प्रहार है, हमारी जिंदगी में क्यों रोड़े बन रहे हो, निरपराध के लिए भी क्यों कोड़े बन रहे हो, तैयार फसलों को देखकर कैसे तुम्हारा मन करता है आने को, अब तुम ही बताओ कहाॅं से लाऊॅं अन्न बच्चों को खाने को, खून पसीने से सींच-सींच कर जब मैं अन्न उगाता हूॅं, तब जाकर कहीं बच्चों के लिए मैं दो वक्त की रोटी पाता हूॅं, लेकिन अबकी बार तो रोटियों से पहले तुम आ गए, मौत का तरल दूत बनकर गगन में तुम छा गए, अब तुम ही बताओ कैसे ह...
पतझड़ मानवता का
कविता

पतझड़ मानवता का

सोनल सिंह "सोनू" कोलिहापुरी दुर्ग (छतीसगढ़) ******************** पेड़ों से छूटा पत्तों का साथ, दिल में बाकी रहे न जज्बात। कोई नहीं बढ़ाता मदद का हाथ, लोग बदल जाते हैं अकस्मात्। ये है नैतिकता के पतझड़ की शुरुआत। कोई समझता नहीं किसी की बात, आपस में टकराने लगे ख्यालात। उजालों को निगलने लगी स्याह रात, बद् से बद्तर हो रहे हालात्। ये है मानवता के पतझड़ की शुरुआत। तरक्की पर अपनों की हृदय में साँप लोट जाता है, ईर्ष्या द्वेष के गर्त में मानव डूब जाता है। अपना कहकर लोगों को छला जाता है, शराफत का लबादा ओढ़े हैवान नजर आता है। अपनत्व का ये पतझड़ थम नहीं पाता है। प्रकृति का पतझड़, मधुमास में बदल जाता है। नई कोपलें आती हैं, पलास भी मुस्काता है। गुलमोहर भी खिलने को आतुर हो जाता है। किन्तु इंसान इंसानियत से दूर ही रह जाता है। मानवीय मूल्यों का ये पतझड़ थम नहीं पाता है। परिचय -...
गौरैया
कविता

गौरैया

बृजेश आनन्द राय जौनपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** अढ़उल के फूलों में चिड़ियों का बसेरा दिन-भर किया-करें धमा-चौकड़ी फेरा एक नहीं, दो नहीं दस - बीस में आऍ कभी-कभी डेरा करें कभी मंडराऍ बच्चे देख हर्ष करें कभी करें टेरा अढ़उल के फूलों में चीड़ियों का बसेरा सुबह-शाम चीं-चीं-चूॅ-चूॅ, करें ना अघाऍ केलों के पत्तों में दौड़ - दौड़ जाऍ लगे वहॉ घोसल में चुज्जों का जनेरा अढ़उल के फूलों में चिड़ियों का बसेरा आर्यन जब पास जाए वो भी फुदक आऍ आर्या भी मम्मी से चावल मॉग लाए चारो तरफ बिखराए बनाकर के घेरा अढ़उल के फूलों में चिड़ियों का बसेरा इधर-उधर दाना चुगे दौड़े - कूॅदे धाऍ जरा सा आहट मिले फर्र से उड़ जाऍ पीछे-पीछे दौड़ें सभी हो - कर फिरेरा अढ़उल के फूलों में चिड़ियों का बसेरा परिचय :-  बृजेश आनन्द राय निवासी : जौनपुर (उत्तर प्रदेश) घोषणा पत...
सावधान
कविता

सावधान

डॉ. किरन अवस्थी मिनियापोलिसम (अमेरिका) ******************** भारतीय संस्कृति पर हमला, भारत की अस्मत पर हमला चाहे कुछ भी हो जाए, कभी नहीं होने देंगे। चाहे कितने बम बना लें, चाहे कितने पत्थर बरसा लें चाहे कितनी मिसाइल चला लें, उनकी न हम चलने देंगे। छेद रहे हैं देश की संस्कृति, देश की ही दीवारों से सचेत रहना है हमको, इन आतंकी गुनहगारों से। यहाँ वहाँ आतंक मचाते, नहीं देश के काम आते आगज़नी, गोली, गन, ये घर में ही बम बरसाते। कभी राजनीति के ज़रिये, कभी कहीं ये छुप जाते कभी देश के टुकड़े करते, ये बोली से बम बरसाते। छुपेरुस्तम ये देश के दुश्मन, बचना है ग़द्दारों से छेद रहे हैं देश की संस्कृति, देश की ही दीवारों से। परिचय :- डॉ. किरन अवस्थी सम्प्रति : सेवा निवृत्त लेक्चरर निवासी : सिलिकॉन सिटी इंदौर (मध्य प्रदेश) वर्तमान निवासी : मिनियापोलिस, (अमेरिका...
रोटी ही बहुत है
कविता

रोटी ही बहुत है

गिरेन्द्रसिंह भदौरिया "प्राण" इन्दौर (मध्य प्रदेश)  ******************** घर में न हों जो चार, दाने तो कहीं भी यार, मिल जाए रूखी सूखी, रोटी ही बहुत है। गंजी खोपड़ी पे केश, बचे हों विशेष शेष, तो भी चार बालोंवाली, चोटी ही बहुत है। जेब में न हो छदाम, रखा हो कुबेर नाम, ऐसे नामी को तो खरी, खोटी ही बहुत है।। लट्ठ देख भाग उठे, बिना लिए प्राण ऐसे, भागे हुए भूत की लँगोटी ही बहुत है।। परिचय :- गिरेन्द्रसिंह भदौरिया "प्राण" निवासी : इन्दौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंद...
मसीहा
कविता

मसीहा

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** वीरान बस्ती का मसीहा भटकता हुआ गाता जाता है गीत तन्हाइयों के देखता है, दिखाता है रूप उन महल खंडहरों के जो बदल चुके हैं खो गए हैं कहीं वीराने में। वीरान बस्ती का मसीहा सुनाता है सुनाता जाता है दर्दो गम अपने और गैरों के यह नहीं सुनते हैं सिर्फ, और सिर्फ खड़े दरख़्त, सुनसान सड़कें और वीराने में भय का आभास। वीरान बस्ती का मसीहा सुनता है सुनाता जाता है। देखता है दिखाता जाता है पर इसके सृजक, ध्यान मग्न है उस बगुले से जो अपने स्वार्थ के लिए गंदे पानी में एक पैर पर खड़ा बात हो रही है किसी सफेद पोते चेहरे की उसे फुर्सत कहां वीरान बस्ती के मसीहा की। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभि...
तमाम मामले ग़ैरों पे डाल देता है
कविता

तमाम मामले ग़ैरों पे डाल देता है

डॉ. जियाउर रहमान जाफरी गया, (बिहार) ******************** तमाम मामले ग़ैरों पे डाल देता है वो बार बार सलीके से टाल देता है मेरा खुदा भी गुनाहों की दे रहा है सज़ा मेरा नसीब भी सिक्का उछाल देता है कभी समझ ही न पाया मैं अपने हाकिम को ज़रा सी बात पे कितने सवाल देता है मैं कितने लफ़्ज़ को आख़िर संभाल कर बोलूं वो एक लहजे पे दिल से निकाल देता है नहीं कुछ होगा तुम्हारी किसी भी कोशिश से वही उरूज वही फिर ज़वाल देता है परिचय :-  डॉ. जियाउर रहमान जाफरी निवासी : गया, (बिहार) वर्तमान में : सहायक प्रोफेसर हिन्दी- स्नातकोत्तर हिंदी विभाग, मिर्जा गालिब कॉलेज गया, बिहार सम्प्रति : हिन्दी से पीएचडी, नेट और पत्रकारिता, आलोचना, बाल कविता और ग़ज़ल की कुल आठ किताबें प्रकाशित, हिन्दी ग़ज़ल के जाने माने आलोचक, देश भर से सम्मान। घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचन...
रहने दो
कविता

रहने दो

राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** कुछ ख्वाहिशें अधूरी है तो रहने दो। मोहब्बत की तरफ पाव नहीं जाते तो रहने दो। अपनापन दिखा कर भी कोई अपना नहीं बनता तो रहने दो। मंदिरों मस्जिदों में घूम कर भी हृदय नेक पाक नहीं होता तो रहने दो। दिलों जान से मोहब्बत करने के बाद भी तुमसे किसी को इश्क नहीं होता तो रहने दो। दिल्लगी के बाद भी कोई दिलदार नहीं बनता तो रहने दो। परिचय :- राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्...