जल ही जीवन है
धर्मेन्द्र कुमार श्रवण साहू
बालोद (छत्तीसगढ़)
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जल है तो कल है,
कल से ही सकल है।
जल है तो फल है,
फल से ही सफल है।
जल है तो अधि है,
अधि से ही जलधि है।
जल है तो वारि है,
वारि बिना व्याधि है।
जल ही तो अज है,
जल से ही जलज है।
जल है तो आज है,
आज से ही समाज है।
जल है तो वन है,
वन से ही जीवन है।
जल है तो घन है,
घन से ही सघन है।
जल है तो बल है,
बल से ही सबल है।
जल है तो हल है,
हल से ही महल है।
जल ही तो नीर है,
नीर से ही समीर है।
जल है तो खीर है,
खीर से ही बखीर है।
जल है तो तन है,
तन से ही वतन है।
जल है तो मन है,
मन से ही मनन है।
जल है तो वर्ण है,
वर्ण से ही सवर्ण है।
जल है तो वर्ग है,
वर्ग से ही संवर्ग है।
जल है तो धन है,
धन बिना निर्धन है।
जल है तो जन है,
जन से ही सज्जन है।
जल है तो जीव है,
जीव से ही सजीव है...
























