कहानी… मेरे पापा की
संजय जैन
मुंबई
********************
पापा जी के चरणों में
अपना शीश झूकता हूँ।
उनके त्याग बलिदान को
अपने बच्चो को सुनता हूँ।
ऐसे पापाजी के चरणों में
अपना शीश झूकता हूँ...।।
जन्म लिया उन्होंने ने
बड़े जमींदार के घर में।
बड़े बेटे बनकर उन्होंने
निभाया अपना कर्तव्य।
यश आराम से जिंदगी
जी रहे थे परिवार के सब।
भगवान की कृपा दृष्टि से
सब अच्छा चल रहा था।।
और भाई बहिन माता पिता का
प्रेम बरस रहा था।
ऐसे पापा जी के चरणों में
अपना शीश झूकता हूँ...।।
भाई बहिन के प्रेम में
वो ऐसे रहे थे।
उन्हें उनके अलावा
कुछ और नहीं दिखता था।
भाई बहिन पर वो अपनी
जान नीछावर करते थे।
ऐसे पापाजी के चरणों में
अपना शीश झूकता हूँ...।।
पर समय परिवर्तन ने
कुछ ऐसा कर दिखाया।
भाई-बहिन और पिता ने
मुँह मोड़ लिया बेटे से।
कल तक जो सबको
बहुत प्यारे भाई लगते थे।
अब वो ही सब की
आँखो में खटकने लगे।
२६ सालों के साथ रहने का
अब अंत हो...









