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ग़ज़ल

दिल आजकल कहीँ न ये लगता तिरे बग़ैर।
ग़ज़ल

दिल आजकल कहीँ न ये लगता तिरे बग़ैर।

शरद जोशी "शलभ" धार (म.प्र.) ******************** दिल आजकल कहीँ न ये लगता तिरे बग़ैर। आती नहीं है रास ये दुनिया तिरे बग़ैर।। तू तो गया है अपने सफ़र पर कहीं मगर। तबसे ही दिल मिरा नहीं धड़का तेरे बग़ैर।। हर लम्हा मुन्तज़िर है मिरा तेरे वास्ते। लगता नहीं है मुझको तो अच्छा तिरे बग़ैर।। तेरे बिना तो ज़िन्दगी होगी नहीं बसर। मरना मुहाल हो गया मेरा तेरे बग़ैर।। तू क्या गया कि टूट गई है मिरी उमीद। हर सिम्त हो गया है अँधेरा तेरे बग़ैर।। खाने को दौड़ती है ज़माने की हर ख़ुशी। किस-किस तरह से दिल को सँभाला तिरे बग़ैर।। अब तो बहार में भी ख़िज़ा की चुभन लगे। लगता 'शलभ' बसन्त भी फीका तिरे बग़ैर।। परिचय :- धार (म.प्र.) निवासी शरद जोशी "शलभ" कवि एवंं गीतकार हैं। विधा- कविता, गीत, ग़ज़ल। प्राप्त सम्मान-पुरस्कार- राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्...
यादें अपने साथ हमारी रखते हैं।
ग़ज़ल

यादें अपने साथ हमारी रखते हैं।

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** यादें अपने साथ हमारी रखते हैं। लोग जो सबसे दुनियादारी रखते हैं। रखते हैं वो पूछ-परख जज़्बातों की, खुशियों में जो ग़म से यारी रखतें हैं । हाथ हमेशा सिर पर रहता है उनका, जो अपनों की जिम्मेदारी रखतें हैं। दूर है सूरज-चाँद यहाँ सबसे कितने, फिरभी रोशन दुनियाँ सारी रखते हैं। खेल यहाँ जब हम-आपस में होता है, वो अपनों से बाज़ी हारी रखते हैं । परिचय :- नवीन माथुर पंचोली निवास - अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति - शिक्षक प्रकाशन - देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान - साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानि...
रहनुमा
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रहनुमा

डॉ. वासिफ़ काज़ी इंदौर (मध्य प्रदेश) ********************** हर रोज़ ईद का त्यौहार होता है। जब मुझे आपका दीदार होता है।। आपके नूर की रोशनी से हरदम। रोशन ये फ़लक हर बार होता है।। मुश्क़िलें हो जाती हैं आसां मेरी। दुआओं से बेड़ा पार होता है।। पड़ते हैं जब आपके मुबारक क़दम। बियाबां भी मुनव्वर गुलज़ार होता है।। मेरे अश्कों की तड़प देखकर। अब समंदर भी रेगज़ार होता है।। वो मेरा रहनुमा है "काज़ी" । उससे ही मुझे प्यार होता है।। परिचय :- डॉ. वासिफ़ काज़ी "शायर" निवासी : इंदौर (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानिया...
उनकी रहती आँख तनी
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उनकी रहती आँख तनी

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** उनकी रहती आँख तनी। जिनकी हमसे है बिगड़ी। होती अक़्सर आपस में, बातों की रस्सा-कस्सी। सुनकर झूठी लगती है, बातें सब चिकनी-चुपड़ी। सम्बन्धों पर भारी है, जीवन की अफ़रा-तफ़री। चेहरा जतला देता है, अय्यारी सब भीतर की। आगे - पीछे चलती है, परछाई सबकी, अपनी। चाहे थोड़ी लिखता हूँ, लिखता हूँ सोची-समझी। परिचय :- नवीन माथुर पंचोली निवास - अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति - शिक्षक प्रकाशन - देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान - साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच...
तुमसे न कर सकी मैं मुलाकात क्या करूँ
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तुमसे न कर सकी मैं मुलाकात क्या करूँ

संगीता केसवानी **************** २२१ २१२१ १२२१ २१२ तुमसे न कर सकी मैं मुलाकात क्या करूँ दिल में दबे रहे मेरे जज़्बात क्या करुँ। खामोश वो नज़र ही कई वार कर गई बोले बिना किए सवालात क्या करूँ। थम सा गया है वक़्त तेरे इंतज़ार में बदले कभी नही मेरे हालात क्या करुँ। क्यों ज़ुल्म ढा रही है तेरी याद अब सनम होती है आँसुओं की ही बरसात क्या करूँ। कितने सफे भरे मुहोब्बत के रंग से अल्फ़ाज़ कर सके न करामात क्या करूँ। परिचय :- संगीता केसवानी घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं...
धूप बनकर कभी हवा बनकर
ग़ज़ल

धूप बनकर कभी हवा बनकर

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** धूप बनकर कभी हवा बनकर। वो निभाता है क़ायदा बनकर। पास लगता है इस तरह सबके, काम आता है वो दुआ बनकर। राह मुश्किल या दूर मंज़िल तक, साथ आता है रहनुमा बनकर। तपते-जलते हुए महीनों का, मन खिलाता है वो घटा बनकर। बात उसकी क़िताब जैसी है, याद रखता है वो सदा बनकर। है उसी का यहाँ सभी रुतबा, ये जताता है वो ख़ुदा बनकर। परिचय :- नवीन माथुर पंचोली निवास - अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति - शिक्षक प्रकाशन - देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान - साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्द...
उन्हीं के हाथ में तैयारियाँ हैं
ग़ज़ल

उन्हीं के हाथ में तैयारियाँ हैं

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** उन्हीं के हाथ में तैयारियाँ हैं। कि जिनके साथ में लाचारियाँ हैं। ज़रूरत है उसे मिलता नहीं है, बड़ी मजबूर जिम्मेदारियाँ हैं। हवा को आसमानों की पड़ी है, जमीं पर जान की दुश्वारियाँ हैं। तरक्क़ी हो रही है झूठ साबित, कड़ी इस दौर की बीमारियाँ हैं। बदल लेता है, चलकर रूप अपना, ये कैसी मर्ज़ की अय्यारियाँ हैं। बचाते हैं वही दामन यहाँ पर, कि जिनके हाथ में पिचकारियाँ हैं। लगेंगे कैसे पंख इन इरादों को, पढ़ें-लिक्खों में जब बैगारियाँ हैं। परिचय :- नवीन माथुर पंचोली निवास - अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति - शिक्षक प्रकाशन - देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान - साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्...
मंज़िलें… ये डगर और है आदमी
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मंज़िलें… ये डगर और है आदमी

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** मंज़िलें, ये डगर और है आदमी। मुश्किलें, ये सफ़र और है आदमी। रात के साथ है नींद की रंजिशें, रतजगे, ये पहर और है आदमी। वक़्त के साथ मिलकर गुजरते रहे, सिलसिले ,ये बसर और है आदमी। होशआ पायेगा किस तरह इस जगह, मैक़दे, ये असर और है आदमी। है सितारों भरा रात का आसमाँ, फासलें, ये नज़र और है आदमी। परिचय :- नवीन माथुर पंचोली निवास - अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति - शिक्षक प्रकाशन - देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान - साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परि...
थे सभी जितने भुलाए सिलसिले
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थे सभी जितने भुलाए सिलसिले

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** थे सभी जितने भुलाए सिलसिले। आज फिर से साथ अपने आ मिले। था हमारा भी सफ़र उस ओर का, जिस तरफ़ से आ रहे थे काफ़िले। जो छुपे थे बादलों की ओट में, वो सितारें आसमाँ पर आ खिले। सब परिंदे दूर तक उड़ते रहे, पेड़ लेक़िन इस जमीं से न हिले। हमने उनका रास्ता अपना लिया, जिनसे हम रख्खा करे शिकवे गिले। हरकतों से बाज़ अपनी आएंगे, तब तलक होते रहेंगे ज़लज़ले। हैं हमारी ओर के रिश्ते - भले, पाएंगे उनसे सभी वैसे सिले। परिचय :- नवीन माथुर पंचोली निवास - अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति - शिक्षक प्रकाशन - देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान - साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया ज...
बदला-बदला मौसम का मन
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बदला-बदला मौसम का मन

अख्तर अली शाह "अनन्त" नीमच (मध्य प्रदेश) ******************** बदला-बदला मौसम का मन, बादल घिर-घिर आते हैं। विरही नैना मन आंगन में, अंगारे बरसाते हैं।। ***** नींदे रातों की रूठी है, रूठे हैं सपने सारे। काले बादल बरसे हैं, बैरन काली रातें हैं।। ***** चुभन बड़ी बेदर्दी से तब, दर्द बढ़ा देती तन का। गीली नर्म हवा के झोंके, जब-जब शूल चुभाते हैं।। **** कितनी पीड़ा होती होगी, आंखों से निकले आँसू। मौन लबों के रहते भी सब, राज उगलते जाते हैं।। ****** पानी आग बुझाने वाला, जब शोले भड़कता है। सिर्फ तपस्वी तन ही उसको, काबू में कर पाते हैं।। ***** मदिरा ऊपर से जब बरसे, पवन नशीला बन जाए। पीने वाले क्यों चूकेगें, अपनी प्यास बुझाते हैं।। ***** गीली राते हों साथी हों, "अनंत" जिनके पहलू में। रोज दिवाली होती उनकी, हर दिन ईद मनाते हैं।। **** परिचय :- अ...
मेरी महफिल में फिर आप…
ग़ज़ल

मेरी महफिल में फिर आप…

निरूपमा त्रिवेदी इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मेरी महफिल में फिर आप आ जाइए दर्द का गीत कोई सुना जाइये इस मुकद्दर का कुछ भी भरोसा नहीं आप खुद ही इसे आजमा जाइए इश्क मेरा समंदर की लहरों सा है डूब कर इसमें मुझको डूबा जाइये जब तलक आप मुझसे मिलोगे नहीं कुछ तसल्ली तो मुझको दिला जाइए मैं मोहब्बत का मारा मुसाफिर हूं अब रास्ता कुछ नया तो बता जाइए मुस्कुरा कर मुझे देखिए आप फिर आप मुझको गले से लगा जाइए प्यार के रास्ते तो कठिन है मगर सिलसिला ऐसा कुछ तो चला आ जाइए परिचय :-  निरूपमा त्रिवेदी निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित ...
मुझे तुमसे इतनी फ़क़त है शिकायत
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मुझे तुमसे इतनी फ़क़त है शिकायत

अब्दुल हमीद इदरीसी मीरपुर, कैण्ट, (कानपुर) ******************** मुझे तुमसे इतनी फ़क़त है शिकायत। न भरपूर मुझको मिली तुमसे उल्फ़त। है बाक़ी अभी देखना हमको हमदम, कहाँ जा रुकेगी ये नाक़िस सियासत। वो करते रहे हैं वो करते रहेंगे, है हासिल उन्हें बस इसी में महारत। नहीं बाल बाँका कोई कर सकेगा, रहेगी जो यकजा बड़ी इक जमाअत। लड़ा दुश्मनों से हमीद उस घड़ी तक, रही जब तलक तन बदन में हरारत। परिचय :- अब्दुल हमीद इदरीसी  निवास - मीरपुर, कैण्ट, (कानपुर) साहित्यिक नाम : हमीद कानपुरी घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने छायाचित्रएवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हि...
जो आसमां को छूने के ख्वाब देखते हैं।
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जो आसमां को छूने के ख्वाब देखते हैं।

मईनुदीन कोहरी बीकानेर (राजस्थान) ******************** जो आसमां को छूने के ख्वाब देखते हैं। हम तो उन्हें दर-दर ठोकरें खाते देखते हैं।। हम तो सदा अपनी औकात में ही रहते हैं। क्योंकि हम तो ख्वाहिशें ही नहीं रखते हैं।। नजूमियों के चक्कर मे न पड़ मेरे दोस्त । हम तो मेहनत व दिमाग से काम करते हैं।। दुनियां में धन-दौलत की तो कमी नहीं । हम तो किस्मत के लिखे पर विश्वास रखते हैं।। "नाचीज़" हम मज़हब के घेरे से कोसों दूर हैं। हम तो सर्वधर्म-समभाव में विश्वास रखते हैं।। परिचय :- मईनुदीन कोहरी उपनाम : नाचीज बीकानेरी निवासी - बीकानेर राजस्थान घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन...
भंवर में सफीना
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भंवर में सफीना

अख्तर अली शाह "अनन्त" नीमच (मध्य प्रदेश) ******************** गजल - १२२,१२२,१२२,१२२ भंवर में सफीना न हिम्मत डरी है। न गम जो झुके हैं खुशी कब झुकी है।। उधर एक कंधों पे वो जा रहा है। इधर एक दुल्हन चली आ रही है।। यही जिंदगी है मुसलसल लड़े जो। गमों में खुशी गुनगुनाती फिरी है।। महामारिया भी बहुत देख ली हैं। डरें तो डरें क्यों खुदा तो नहीं है।। खिंजा है कभी तो कभी हैं बाहरें। झरे पात शाखे शजर तो हरी है।। भले रात कितनी ही लंबी रही हो। मगर रात की भी सहर तो हुई है।। हकीकत यही है बता दो सभी को। चली कब किसी की भी दादागिरी है।। खुशी कब किसी की ऐ "अनंत" हुई है। बड़ी बेवफा है बड़ी मनचली है।। परिचय :- अख्तर अली शाह "अनन्त" पिता : कासमशाह जन्म : ११/०७/१९४७ (ग्यारह जुलाई सन् उन्नीस सौ सैंतालीस) सम्प्रति : अधिवक्ता पता : नीमच जिला- नीमच (मध्य प...
कही हमनें ज़ुबानी और थी
ग़ज़ल

कही हमनें ज़ुबानी और थी

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** कही हमनें ज़ुबानी और थी। हक़ीक़त में कहानी और थी। सभी ने बात पूछी और पर, हमें अपनी सुनानी और थी। परिंदों की उड़ानों में वहाँ, हवाओं की रवानी और थी। किनारें जा मिले मझधार में, नदी की वो जवानी और थी। कमाई,नाम ,शोहरत,दाम से, हमें इज्ज़त कमानीऔर थी। यहाँ आबाद थे सब शहर पर, ख़ुशी की राजधानी और थी। परिचय :- नवीन माथुर पंचोली निवास - अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति - शिक्षक प्रकाशन - देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान - साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर...
उम्र को हो गए हासिल हम भी
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उम्र को हो गए हासिल हम भी

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** उम्र को हो गए हासिल हम भी। आप के हो गए क़ाबिल हम भी। देखकर आप हैं मदहोश हमें, हुस्न से हो गए क़ातिल हम भी। वो जिसे राह पर छोड़ा हमने, पा गए आज वो मंजिल हम भी। पास आई ये मयकशी कैसी, बिन पिये हो गए ग़ाफ़िल हम भी। रोज दरिया के रहे साथ सफ़र, इसलिए हो गए साहिल हम भी। परिचय :- नवीन माथुर पंचोली निवास - अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति - शिक्षक प्रकाशन - देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान - साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्...
लोग जब सिर पे बिठाने लग गए
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लोग जब सिर पे बिठाने लग गए

अख्तर अली शाह "अनन्त" नीमच (मध्य प्रदेश) ******************** लोग जब सिर पे बिठाने लग गए। भावनाएं हम भुनाने लग गए।। **** बैठ जब कमजोर कंधों पर गए। रोज ही उत्सव मनाने लग गए।। ***** जो हमें बर्बाद करने के लिए। आए थे वो सब ठिकाने लग गए।। ***** जो छिड़कते थे नमक वे लोग भी। घांव पर मरहम लगाने लग गए।। ***** बैठ चरणों में गए, काबिल हुए। लोग वो ईनाम पाने लग गए।। ****** नेकियाँ कर वो छपे अखबार में। लोग कुछ नजरें झुकाने लग गए।। ***** झूठ अपना सच बना पाए न हम। अब तलक कितने बहाने लग गए।। ***** गांठ रिश्तो में पड़ी "अनंत "ऐसी। खुल न पाई है जमाने लग गए।। परिचय :- अख्तर अली शाह "अनन्त" पिता : कासमशाह जन्म : ११/०७/१९४७ (ग्यारह जुलाई सन् उन्नीस सौ सैंतालीस) सम्प्रति : अधिवक्ता पता : नीमच जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि ...
कहने की ही शान हुआ हूँ
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कहने की ही शान हुआ हूँ

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** कहने की ही शान हुआ हूँ। मैं कितना नादान हुआ हूँ। रखते-रखते खैर-ख़बर सब, ख़ुद से ही अंजान हुआ हूँ। सोचे लेकिन मिल ना पाये, उन सपनों की खान हुआ हूँ। सुनकर बातें सब अंदर की, दीवारों के कान हुआ हूँ। कर के थोड़ी किस्सागोई, मैं अपनी पहचान हुआ हूँ। नींदों के संग ख़्वाब नहीं हैं, सुनकर मैं हैरान हुआ हूँ। परिचय :- नवीन माथुर पंचोली निवास - अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति - शिक्षक प्रकाशन - देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान - साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक ...
डूबते सूरज की रंगत
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डूबते सूरज की रंगत

विवेक रंजन 'विवेक' रीवा (म.प्र.) ******************** डूबते सूरज की रंगत फिर से बहलाने लगी है, पास आकर फिर उदासी ज़ख्म सहलाने लगी है। जाने किनकी और किन गुस्ताखियों का कर्ज़ है, मुस्कुराती ज़िंदगी सब आज कुम्हलाने लगी है। यूं तो हसीं ख्वाब के गुंचे खिले हैं बाग में, देखता हूँ उन सभी की शाम ढल जाने लगी है। मुट्ठियों में तुम हवा को कैद करते रह गये, रूह की ताकत के आगे मौत शरमाने लगी है। फासले का फलसफा तुम मान भी जाओ ‘विवेक’, रफ्ता-रफ्ता ज़िंदगी अब राह पर आने लगी है। परिचय :- विवेक रंजन "विवेक" जन्म -१६ मई १९६३ जबलपुर शिक्षा- एम.एस-सी.रसायन शास्त्र लेखन - १९७९ से अनवरत.... दैनिक समय तथा दैनिक जागरण में रचनायें प्रकाशित होती रही हैं। अभी हाल ही में इनका पहला उपन्यास "गुलमोहर की छाँव" प्रकाशित हुआ है। सम्प्रति - सीमेंट क्वालिटी कंट्रोल कनसलटेंट के रूप में विभिन्न स...
करते करते क़िस्सागोई
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करते करते क़िस्सागोई

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** करते करते क़िस्सागोई। हमनें सच्ची बात डुबोई। मन ने धीरज रख्खा लेक़िन, आँख हमारी झर-झर रोई। जाग रहे थे हम ही तन्हा, जब थी सारी दुनियाँ सोई। आज वही हम काट रहें हैं, फ़सल वही जो हमनें बोई। भूल गए अब वो ही हमको, हमने जिनकी याद सँजोई। कान सुनी या आँखों देखी, बात हमारी माने कोई। परिचय :- नवीन माथुर पंचोली निवास - अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति - शिक्षक प्रकाशन - देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान - साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं...
जीवन साथी
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जीवन साथी

अख्तर अली शाह "अनन्त" नीमच (मध्य प्रदेश) ******************** सब का तन जीवन साथी है, सब का मन जीवन साथी है। होता परिवर्तन पल-पल पर, परिवर्तन जीवन साथी है।। जिस पर खेला बचपन मेरा, सर्दी गर्मी बरसात सही। ना भूला हूँ उस आंगन को, वो आंगन जीवन साथी है।। पानी से दूर रहा कब मैं, पानी है मेरे जीवन में। जल जीवन है सब देख रहे, जल का धन जीवन साथी है।। सांसो की सारी माया है, आती जाती हर सांस कहे। वायू का जीवन मैं होता, जो नर्तन जीवन साथी है।। गर्मी जीवन का लक्षण है, ठंडा होना मर जाना है। अग्नि का दामन छूटा कब, ये दामन जीवन साथी है।। है गगन नहीं कुछ भी लेकिन, ये अंश मगर मानव का है। संतुलित रखें जो अंशों को, वो पावन जीवन साथी है।। हम सफर रहा वो बनकर के, पग-पग पर साथ दिया मेरा। वो भी जीवन साथी, उसका, अपनापन जीवन साथी है।। परिचय :- अख्तर अली श...
कभी तुम पाँव चलना सीख लोगे
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कभी तुम पाँव चलना सीख लोगे

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** कभी तुम पाँव चलना सीख लोगे। गिरोगे तो सम्भलना सीख लोगे। मिलेगा हौसला इन गल्तियों से, घिरोगे तो निकलना सीख लोगे। जुबाँ तक आई कोई बात वैसी, कहोगे तो बदलना सीख लोगे। कभी पानी से थोड़ा बर्फ़ में तुम, जमोगे तो पिघलना सीख लोगे। चकोरों की शिकायत चाँदनी से, सुनोगे तो मचलना सीख लोगे। जो संगेमरमरी पर हाथ अपना, रखोगे तो फिसलना सीख लोगे। परिचय :- नवीन माथुर पंचोली निवास - अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति - शिक्षक प्रकाशन - देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान - साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां...
जिंदगी कटती रहे।
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जिंदगी कटती रहे।

धीरेन्द्र कुमार जोशी कोदरिया, महू जिला इंदौर म.प्र. ******************** इस तरह यह जिंदगी कटती रहे। सुख बढ़ें, दुश्वारियां घटती रहें। हम बढ़ें, तुम भी बढ़ो तो बात हो। दूरियां दिल की यूं ही पटती रहें। खुशबुओं से प्यार की महके जहां, बेल उल्फत की सदा फलती रहे। होंठ चुप हों, नयन से बातें करो, जब चली है बात तो चलती रहे। दुश्मनी के दायरों को कम करो, ये बुराई क्यों यूं ही बढ़ती रहे। जो पेड़ गिरते हैं, नए फिर रोपिए, जोत जीवन की सदा जलती रहे। जी तेरे अंदाज में अपनी खुशी से, बात दुनिया को खले, खलती रहे। परिचय :- धीरेन्द्र कुमार जोशी जन्मतिथि ~ १५/०७/१९६२ जन्म स्थान ~ महू ज़िला इन्दौर (म.प्र.) भाषा ज्ञान ~ हिन्दी, अंग्रेज़ी, उर्दू, संस्कृत शिक्षा ~ एम. एससी.एम. एड. कार्यक्षेत्र ~ व्याख्याता सामाजिक गतिविधि ~ मार्गदर्शन और प्रेरणा, स...
आपसे जब हुई दूरियाँ
ग़ज़ल

आपसे जब हुई दूरियाँ

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** आपसे जब हुई दूरियाँ। हो गई कितनी मजबूरियाँ। हमने उतने बढ़ाये क़दम, मिल गई जितनी मंजूरियाँ। क्यों सभी ने मना कर दिया, आज लेने से दस्तूरियाँ। थे जहाँ फ़िर वहाँ आ गये, पाँवों में बंध गई धूरियाँ। हम भले हाँ कहें, भले ना कहें, पाल ली हमनें मगरूरियाँ। परिचय :- नवीन माथुर पंचोली निवास - अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति - शिक्षक प्रकाशन - देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान - साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा ...
जब मैं हुई बीमार
ग़ज़ल

जब मैं हुई बीमार

रजनी गुप्ता 'पूनम चंद्रिका' लखनऊ ******************** १२२२ १२२२ १२२२ १२२२ कभी जब मैं हुई बीमार बेटे काम आते हैं न होना माँ परेशाँ तुम यही कहकर लुभाते हैं बिना मेरे कहाँ ये सब कहीं आराम पाते हैं नहीं होते मगर नाराज़ चाहे हाँफ़ जाते हैं बनाते रोटियाँ बेडौल टेढ़ी या कभी मोटी न रहने दें मुझे भूखा क्षुधा मेरी मिटाते हैं निहारूँ जब कभी भी मैं बड़ा ही प्यार आता है निवाले तोड़कर मुझको वे ही खाना खिलाते हैं दवा खाओ चलो मम्मी सदा आवाज़ देकर वे समय अब हो गया हर पल यही मुझको बताते हैं न ख़ुद का होश है उनको न चिंता है उन्हें अपनी लगें चलने मेरी मम्मी इसी में दिन बिताते हैं ज़रा सी खाँस दूँ तो वे चले आते तुरत दौड़े कहो क्या हो गया मम्मी बड़ी चिंता जताते हैं तरस जाती है ये 'रजनी' बिठा लूँ गोद में उनको शिफ़ा मिल जाए अब मुझको यही बेटे मनाते हैं परिचय : रजनी गुप्ता 'पूनम चंद्रि...