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मैं जीता जागता मजदूर हूँ

धर्मेन्द्र कुमार श्रवण साहू
बालोद (छत्तीसगढ़)
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मैं काम से चूर हूँ इसलिए मजबूर हूँ
मैं बहुत दूर नहीं इसलिए मजदूर हूँ

मैं आपके पास हूँ तभी तो सबके साथ हूँ
मेरे द्वारा प्रयास ही सबके लिये आस हूँ

मैं श्रम का नूर हूँ इसलिए मजबूर हूँ
मैं बहुत दूर नहीं इसलिए मजदूर हूँ

मेरे पास कान हैं रोज खोलता दुकान हूँ
मेरे पास हाथ हैं मिस्त्री बनाता मकान हूँ

मैं तो कोहिनूर हूँ इसलिए मजबूर हूँ
मैं बहुत दूर नहीं इसलिए मजदूर हूँ

मैं हर रोज करम करता तब परिवार चलता है
मैं लगन से मेहनत करता हूँ पूरे संसार चलता है

मैं महज दूर नहीं इसलिए मजबूर हूँ
मैं बहुत दूर नहीं इसलिए मजदूर हूँ

पंचतत्व ढांचा से बना ये हाड़ है इसलिए पहाड़ हूँ
जंगल में मंगल मनाता है इसलिए शेर का दहाड़ हूँ

मैं श्रम से चूर हूँ इसलिए मजबूर हूँ
मैं बहुत दूर नहीं इसलिए मजदूर हूँ

जल जंगल जमीन पोषण करना ही मेरा काम है
राजा रंक फकीर को जीवन देना ही मेरा विराम है

खून पसीना बहाता एक तस्वीर हूँ
मैं बहुत दूर नहीं इसलिए मजदूर हूँ

मिलजुल कर सड़क बनाता कंधों से भार उठाता हूँ
न थकता हूँ न हारता हूँ बस मंजिल तक पहुंचाता हूँ

मैं श्रम करता जरूर हूँ पर मजबूर हूँ
मैं बहुत दूर नहीं इसलिए मजदूर हूँ

तन मन वचन से मेहनत करता तब धन कमाता हूँ
कारखाना में लोहा गलाकर पटरी पर रेल दौड़ाता हूँ

श्रम का गरूर नहीं परन्तु मजबूर हूँ
मैं बहुत दूर नहीं इसलिए मजदूर हूँ

श्रवण श्रमिक बनकर श्रम करता स्वर्ग वह बनाता है
पारिश्रमिक देकर मान बढ़ाता सम्मान वह दिलाता है

मैं कूड़े कचरा घूर हूँ किन्तु मजबूर हूँ
मैं बहुत दूर नहीं इसलिए मजदूर हूँ

परिचय :- धर्मेन्द्र कुमार श्रवण साहू
निवासी : भानपुरी, वि.खं. – गुरूर, पोस्ट- धनेली, जिला- बालोद छत्तीसगढ़
कार्यक्षेत्र : शिक्षक
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।


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