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मैं एक नारी हूँ

मंजू लोढ़ा
परेल मुंबई (महाराष्ट्र)

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मैं एक नारी हूँ।
सदियों से अपनी
परंपराओं को
निभाया हैं,
उसके बोझ को
अकेले ढोया हैं,
इस पुरूष प्रधान
समाज ने हरदम
हमको दौयम
दर्जे पर रखा है,
अपनी ताकत को
हम पर आजमाया है।
पर अब मुझे दुसरा
दर्जा पसंद नहीं
मैं अपनी शर्तों पर
जीना चाहती हूँ।
हक और सन्मान के साथ
रहना चाहती हूँ।
मेरी सहृदयता को मेरी
कमजोरी मत समझो।
मैं परिवार को न संभालती,
बच्चों की परवरिश न करती,
बुर्जुंगो की सेवा न करती,
पति को स्नेहही प्रेम न देती,
तो क्या यह समाज जिंदा रहता?
मै कोमल हूँ, पर कमजोर नहीं,
अगर कमजोर होती तो
क्या यह नाजुक कंधे
हल चला पाते?
पहाड़ों की उतार-चढा़व पर
काम कर पाते?
घर और बाहर की दोनों
दुनिया क्या यह संभाल पाते?
मेरे त्याग को तुमने
मेरी कमजोरी समझ लिया,
घर-परिवार
बचाने की भावना को
मेरी मजबुरी समझ लिया।
अगर नारी पुरूष के
अहंम को न पोषती,
तो पुरूष आज कहाँ होता?
पुरूष के बाहरी दुनिया के
परेशानियों को वह न हरती,
तो पुरुष कहाँ होता?
हमें तो परमात्मा ने
अपने गुणों से रंगा है
अपनी भावनाओं से
हमें गढ़ा है
इसलिये हम सिर्फ
कल्याण करना चाहती है,
इसलिये पुरूष से कई-कई
पायदान उंची होकर भी
उनके सामने
नतमस्तक हो जाती हैं।
झगडना हमें पसंद नहीं
इसलिये हम सिर्फ
स्नेह-ममता-प्रेम
बांटती है-फिर कहुंगी
इसे हमारी
कमजोरी मत समझो,
घर की आधारशिला समझो।
मुझे बिल्कुल पसंद नहीं कि
जिस घर को मैनें
अपने खून सें सींचा
उसपर मेरा
अधिकार ही नहीं
नाम पट्टिका
पर मेरा नाम नहीं।
अब घर हम
दोनों का सांझा होगा,
नेम प्लेट पर सिर्फ
मेरा ही नाम होगा।
मुझे कतई पसंद नहीं कि
मैं अपनी पसंद का
भोजन न करूं
अपनी मर्जी से
कहीं आ-जा न पाऊँ।
अब मैं भरपूर,
पल-पल
जीना चाहती हूँ।
हवाओं में
उड़ना चाहती हूँ
सारे बंधन,
सारी पाबन्दियों की
बेडियों को तोड़,
मुक्त आकाश में
स्वच्छंद पक्षी की तरह
उड़ना चाहती हूँ।
मै सिद्ध कर चुकी हूँ-
अपने आप को,
अब कोई अग्निपरीक्षा
नहीं, कोई जंजीरों की
बेड़ियां नहीं,
परिवार की
जिम्मेदारियों के साथ
खुद के प्रति जिम्मेदारी
निभाना चाहती हूँ।
खुद की मनपसंदा बनकर,
खुद की पीठ थपथपाकर,
हरदम खुश रहना चाहती हूँ।
मुझे पसंद नहीं सिर्फ
तुम्हारी तकलीफों को सुनुं
सिर्फ तुम्हारे
दुःख की भागीदार बनुं,
अब मैं तुम्हारे सुख में
सांझेदार होना चाहती हूँ।
घर के सभी मसलों में
मेरा भी मत रखना चाहती हूँ।
मुझे तुम अनदेखा
अब न कर पाओंगे।
हर कदम पर मेरी
उपस्थिती दर्ज रहेंगी।
सोच लो आज से हम,
हर कदम, हमसफर है,
जितना जीने का तुमको हक
उससे कम मुझे स्वीकार नहीं।
युद्ध क्षेत्र से लेकर
आसमानी यात्रा में
हमने अपना
परचम फहराया है।
अपनी बुद्धीमत्ता का
लोहा मनवाया है।
दुनिया को दिखलाया है
किसी से हमारा
कोई मुकाबला नहीं
क्योंकि हम
किसी से कम नहीं।

परिचय :- मंजू लोढ़ा
निवासी : परेल मुंबई (महाराष्ट्र)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

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