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जिद
कविता

जिद

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ ******************** वो जिद में अड़े रहे कि घर में लक्ष्मी आयी है, कुछ के मन में था कि खुशियां लायी है, पर उनके मन में था मुसीबत आयी है, पता नहीं किन मनहूसों ने कब से ये भ्रांतियां फैलायी है, वो जिद पर अड़े रहे लड़की है सिर्फ चूल्हा फूंकेगी, वो चूल्हा फूंकती रही, क़िताबों से हवा देते चूल्हे को, अक्षरों के भंडार लूटती रही, पर वह भी जिद पर थी अज्ञानता, निरक्षरता को चूल्हे में आग के हवाले निरंतर करती रही, फिर चुपके से सायकल चलायी, स्कूटी चलायी, कार चलायी, ट्रेन चलायी, एरोप्लेन चलायी, पर वो पुराने खयालात वाले का जिद अभी भी है लड़की चूल्हा फूंकेगी, जनाब अब तो अपने भंवर से बाहर आकर देख, तुम्हारे कलुषित अरमानों की धज्जियां उड़ाते हुए वो देश भी बखूबी चला लेती है, तुम्हारे दूषित संस्कार, ढकोसले, पाखण्डों को मटियामेट करती हुई, सार...