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पत्थरों पर उकरे हुए हैं कई सवाल
कविता

पत्थरों पर उकरे हुए हैं कई सवाल

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* पत्थरों पर उकरे हुए हैं सदियों से कई सवाल हर किसी ने वक़्त के सीने पे अपना हाल उतारा है। किसी ने शिलालेख में गुदवा दी अपनी दास्तां, किसी ने काग़ज़ की पनाह ली, कुछ हवाओं से कह गए दिल का हाल, किसी ने फूलों को अपनी कहानी सुना दी, चाँद के पास भी होंगे अनगिनत फ़साने, रात की खामोशियाँ… ये खामोश खड़े पर्वत-पठार, दरख़्त और समंदर की नम रेत में, कोहरे में भीगी घास की नमी और पत्तियों की सरसराहट में किसी ने नदियों को सौंप दिए होंगे भावनाओं के अधजले ख़त, कोई सागर की लहरों में अपने अरमान बहा गया होगा, और कहीं झरनों की फुहार में अपने अधूरे सपने भिगो दिए होंगे सन्नाटों में भी कुछ गूंज रहे होंगे अनकहे गीत, कुछ शिशिर की हवाओं में अपने राज़ छोड़ गए होंगे, पवन की सरसराहट में सूरज की पहली किर...
अंतर्मन से परिचय
कविता

अंतर्मन से परिचय

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* मैंने स्वयं को शब्दों की भीड़ में नही मौन की गहराइयों में पहचाना है जहाँ हर प्रश्न उत्तर नहीं माँगता और हर उत्तर सच नहीं होता। समय ने मुझे तोड़ा नही बस परत-दर-परत खोल दिया- जो दिखा वो मेरा नहीं था और जो मेरा था उसे देखने की दृष्टि सबके पास नहीं होती। रिश्तों की भाषा अब सरल नहीं रही यहाँ सम्मान भी शर्तों पर मिलता है। जो समझ सका वही ठहरा बाक़ी सबने भीड़ को अपनाया और मुझे फालतू कह दिया। मैंने शिकायतों को शब्द नहीं बनाया क्योंकि मौन में भी मेरी अस्मिता बोलती है अब न सफ़ाई देने की आदत है न हर चोट का हिसाब रखने का धैर्य। जो चला गया वो ग़लत नहीं था बस मेरी गहराई के योग्य नहीं था और जो ठहर गया वो कोई वादा नही एक अनुभूति है। अब मैं स्वयं से भागता नही ना ही किसी को ...
जीवन एक प्रश्न
कविता

जीवन एक प्रश्न

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* एक प्रश्न जो हर मोड़ पर नया हो जाता है कभी धूप में तप कर मजबूत कभी ओस बनकर पल में खो जाता है। हम चलते हैं मंज़िल की तलाश में पर रास्ते ही हमें पहचान देते हैं कभी हार में छिपा सबक कभी जीत में नम्रता सिखा देते हैं। सत्य यह है कि जीवन किसी ठहरे पानी जैसा नहीं यह बहती नदी है जो पत्थरों से टकराकर और भी निर्मल और भी प्रखर हो जाती है। हम जिस क्षण को पकड़ना चाहते हैं वह हवा बनकर फिसल जाता है और जो क्षण हमें तोड़ देता है वही हमें नया आकार दे जाता है। अंत में समझ आता है जीवन को समझना नहीं जीवन को जीना पड़ता है हर अनुभूति को स्वीकार कर खुद को धीरे-धीरे प्रकाश की ओर ले जाना पड़ता है। परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरवरी निवासी...
९० के दशक का प्रेम
कविता

९० के दशक का प्रेम

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* ९० का प्रेम भी अजीब था किसी को देखने के लिए जाने कितने प्रेमियों की साइकिल की चेन हमेशा ही उतरा करती थी. कितनी खिड़कियों को आँखें मिलती थी किस टाइम पर उन्हें खुलने का अधिकार मिला था सिर्फ वही समझती थी. रंगबिरंगे कागज़ पर कितने जवां दिलों ने कांपते हाथों से प्रेम की दास्तान लिखी. कितने प्रेमियों ने नोटबुक के आखरी पृष्ठ पर अनजान सी आँखें बनायी होगी तो किसी ने मेहंदी की डिजाइन पर अपने महबूब का नाम छुपा कर लिखा होगा. अगर प्रेम गीत नहीं लिखे गए तो मोहब्बत अंदर ही अंदर घुटती रहती फिर एक दिन टेंट हाउस का सामान डाले टेंपो आता तो पता चलता अपना चांद किसी दूसरी की छत की चांदनी बन चुका. कितनी अच्छी मोहब्बत थी बिल्कुल "उसने कहा था" ये कहानी हर किसी ने पढ़ी थी कितने...
हवाओं को लौट आने दो
कविता

हवाओं को लौट आने दो

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* पीपल पर अपनी प्रार्थनाएँ टाँग सूर्यास्त का पीछा करते हुए जो आत्माएँ आकाश के भी आकाश में गरुड़ों सी चली गई हैं। देखना, अभी वे लौटेंगी क्योंकि पृथ्वी ही सबको अर्थ और संदर्भ देती है यह पृथ्वी ही है। जो शून्य को आकाश की संज्ञा देती है, यह पृथ्वी ही है। जो प्रकाश को धूप की संज्ञा देती है केवल हवाओं को लौट आने दो- ये सारे के सारे वन; कानन और अरण्य जो अभी भाषाहीन लग रहे हैं आकंठ प्रार्थनामय हो जाएँगे। सारी सृष्टि संध्याकालीन प्रार्थना-पुस्तक-सी पवित्र हो जाएगी। एक-एक पत्र संकीर्तन करता हुआ वैष्णव लगेगा केवल हवाओं को लौट आने दो- यही पीपल पत्र-प्रार्थनाएँ करता हुआ चैतन्य लगेगा, सारी वनस्पतियाँ माधव-गान करती हुई प्रभु के वन-विहार के अनुष्ठान-सी लगेंगी। महाभाव और क्या ...
मैं और मेरी कविता
कविता

मैं और मेरी कविता

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* जब मैं लिखने बैठता कविता, लेखनी मुझसे रूठ जाती है, वह कहती मेरा पीछा छोड़ दो, मुझसे अपना नाता तोड़ दो, क्या तुम मुझे सौंदर्य में ढाल सकोगे, इस घुटन भरे माहौल से निकाल सकोगे, क्या तुम कुछ अलग लिख सकोगे, या तुम भी दुनिया की बुराइयों को, अपनी रचना में दोहराओगें ? दहेज, भूख, बेकारी के शब्द में अब ना मुझको जकड़ना, हिंसा दंगों या अलगाव के चक्कर में ना पड़ना, नेताओं को बेनकाब करने में मेरा सहारा अब ना लेना, बुराइयां ना गिनाना अब बीड़ी सिगरेट या शराब की, उकता गई हूं अब मैं, बलात्कार हत्या या हो अपहरण, इन्हीं शब्दों ने किया है जैसे मेरे अस्तित्व का हरण। लेखनी बोलती रही, मुझे मालूम है तुम इंसानियत की दुहाई दोगे, इसलिए मैं पास होकर भी हूं पराई। अगर लिखना हो तो लिखो, प्रकृति की गोद में बैठ कर , ...
आने वाली पीढ़ी के नाम
कविता

आने वाली पीढ़ी के नाम

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* हमारी सन्तानों! याद रखना अपने बेहतर दिनों में और अचानक टूट पड़ने वाली विपत्तियों के समयों में भी कि बीसवीं सदी के अन्त में जब लगभग सारा कुछ नष्ट हो गया था एक ज़लज़ले में, हमने तम्बू गाड़े थे दिन को आग उगलते, रात को हड्डी कँपाते निचाट रेगिस्तानों में। हम बहुत थोड़े ही बचे थे और जो भी थे, बिखरे हुए थे। हाँ, लगभग सब कुछ खो दिया था हमने। बस, अपने साथ बचाकर ले आ पाये थे जीने की ज़रूरत और कुछ उम्मीदें, थोड़ी आग और रोशनी। ख़ून और पसीना अपना था ही, बची हुई उम्र थी, विचार और अनुभव थे अपनी पिछली पीढ़ियों से और अपने ख़ुद के प्रयोगों से अर्जित। याद रखना कि इतनी सी, बस इतनी ही सी चीजों से हमने एक नयी शुरुआत की थी एक बेहद कठिन समय और बेहद ख़राब मौसम में तमाम-तमाम विभ्रमों, तटस्थताओं और रहस...
पश्चाताप क्या हैं?
कविता

पश्चाताप क्या हैं?

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* पश्चाताप स्मृति रंध्रों से पीड़ा का रिसाव है पश्चाताप हमारी समझ और विवेक का अधूरापन है और हमारे बेहतर मनुष्य होते जाने का प्रमाण भी। पश्चाताप हमारी वस्तुपरकता को ठण्डी निर्ममता से बचाता है और सारी गतिविधियों के केन्द्र में मनुष्य को रखना सिखाता है। पश्चाताप इतिहास का संवेदनामूलक समाहार है और संवेदना का इतिहास लिखने की सबसे अच्छी भाषा है। हम बार-बार पीछे मुड़कर देखते हैं और जीवित रहने के लिए पश्चाताप करने लायक कुछ न कुछ ढूँढ लाते हैं। पश्चाताप प्रेरणा की विकल आत्मा है। पश्चाताप यदि देवता के सामने पाप स्वीकृति या क्षमायाचना बन जाये तो हम कमज़ोर, स्वार्थी और घुटे हुए पापी बन जाते हैं पश्चाताप आत्मकथा का विवेक और कविता की प्राणवायु है। पश्चाताप हमें तानाशाह बनने और त...
नादान है इंसान
कविता

नादान है इंसान

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* अभी तक नादान है इंसान उसी डाल को काटे जिस पर खुद बैठा नादान। अपने पैर कुल्हाड़ी मारे दिखा दंभ अभिमान। जानबूझ सच भूल गया सब मन के माने-मान, उलटी पढ़ी ज्ञान की पाठी उल्टा हो गया ज्ञान। सदा नकारे सच को मूरख होश करे न भान स्वार्थ में हो अंधा ऐसा बेचा सब ईमान। खुद की करनी छुपे न खुद से झूठी -धरता शान, अंदर-अंदर रहता हरदम परेशान -हलकान। तन को खाना-पीना सबको हासिल सभी जहान मन की भूख अपूर सदा ही मन की माँग अजान। मन मूरख खुद भी नहीं जाने क्या उसका अरमान पगलाया फ़िरता दुनिया में चढ़ गई मुफ्त थकान। मन के संग-संग मूरख लागे ज़रा करे न ध्यान मन के संग-संग घायल होकर घर लौटे नादान। मन नहीं जाना जब तक अपना सच न हो संज्ञान मन नहीं जाना तब तक अपना बोध हुआ न ज्ञान. अभी तक नादान है इ...
स्वच्छंदता
कविता

स्वच्छंदता

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* कितनी उन्मुक्तता है स्वतंत्र विचरण करते हैं। सम्पूर्ण धरा और गगन के बीच ना आने का व्यय ना ही वाहन शुल्क देना है आय व्यय का ब्यौरा. पर क्या इनके ह्रदय में शांति की अनुभूति है ? संभवत: नहीं क्योंकि शांति होती तो इधर उधर विचरण करने की आवश्यकता नहीं होती। तो फिर इस स्वच्छंदता रूपी स्वतन्त्रता का परिणाम क्या है ? फिर भी सभी उन्मुक्त सभी स्वछंद रहने को आतुर रहते हैं पंछी की तरह। परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरवरी निवासी : पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "समाजसेवी अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४" से सम्मानित घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। ...
अपभ्रंश…
कविता

अपभ्रंश…

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* प्रेम- अद्भुत भ्रम है हम दूर रहकर भी साथ रहते हैं और हम साथ रहते हुए भी अलग रहते हैं। तुम्हारे साथ रहकर भी मैंने अपने भीतर एक अज्ञात शून्य पाया। स्मृतियों की परतों में न जाने कितनी बार हमने संग-साथ रचा- पर समय की कलम ने हर अध्याय को अधूरा ही छोड़ा।। तुम मेरे समीप थे, फिर भी मेरे स्पर्श तक कभी नहीं पहुँचे।। मानो एक पारदर्शी दीवार हमारे मध्य खड़ी थी, जो किसी अक्षर की तरह देखी जाती रही, पढ़ी कभी नहीं। विचित्र है- जीवन की व्याख्या हमने मिलकर लिखी, पर अर्थ अलग- अलग निकाले। और मैं आज सोचता हूँ- क्या प्रेम सचमुच दो आत्माओं का एकाकार होना है? या फिर अलग-अलग आत्माओं का अपने-अपने एकांत को जी भरकर जीने का अवसर? क्योंकि मैंने जाना है, तुम्हारे साथ रहकर भी मैं अप...
स्वछंद पंछी की तरह
कविता

स्वछंद पंछी की तरह

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* कितनी उन्मुक्तता है स्वतंत्र विचरण करते हैं। सम्पूर्ण धरा और गगन के बीच ना आने का व्यय ना ही वाहन शुल्क देना है आय व्यय का ब्यौरा पर क्या इनके ह्रदय में शांति की अनुभूति है ? संभवत: नहीं क्योंकि शांति होती तो इधर उधर विचरण करने की आवश्यकता नहीं होती। तो फिर इस स्वच्छंदता रूपी स्वतन्त्रता का परिणाम क्या है ? फिर भी सभी उन्मुक्त सभी स्वछंद रहने को आतुर रहते हैं पंछी की तरह परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरवरी निवासी : पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "समाजसेवी अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४" से सम्मानित घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। ...
अ अत्याचार … ह से हत्या …
कविता

अ अत्याचार … ह से हत्या …

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* अ से अनार या अमरूद नहीं वर्तमान समय के अनुरूप अ से अनर्थ या अत्याचार लिखने की जरूरत है. कोशिश करता हूँ कि क से क़लम या करुणा लिखूँ लेकिन मैं लिखने लगता हूँ क से कर्कशता या कट्टरता. ख से खरगोश लिखता आया हूँ लेकिन ख से अब किसी ख़तरे की आहट आने लगी है. मैं सोचता था फ से फल ही लिखा जाता होगा बहुत सारे फल लेकिन मैंने देखा तमाम फल जा रहे थे ज़ालिमों के गले में ग्रास बनकर हज़म होने के लिए. कोई मेरा हाथ जकड़ता है और कहता है भ से लिखो भय जो अब हर जगह मौजूद है द दमन का और प पतन का सँकेत है. आततायी छीन लेते हैं हमारी पूरी वर्णमाला वे भाषा की हिंसा को बना देते हैं समाज की हिंसा ह को हत्या के लिए सुरक्षित कर दिया गया है हम कितना ही हल और हिरन लिखते रहें वे ह से हत्या लिखते रहते ह...
अपनोंं से निष्कासित
कविता

अपनोंं से निष्कासित

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* एक टुकड़ा बादल का छोटा सा आंँखों के काजल- सा भटक रहा था यतीम- सा मगर मुझे लगा इसमें कोई बात है मौसम बरसात ‌का हुजूम बादलों का उमड़-घुमड़ बरस रहा फिर क्या वज़ह कि सूखी आंखों से गीली धरती ताक रहा. बस पूछ लिया मैंने अकेला अनमना है क्यों उसने देखा देर तक देखा फिर उदास- सा होके हमसे कहा अपनोंं से निष्कासित हूँ कहा गया था आज बरसना है झुग्गी पर शहर‌ के दांएंँ कोने की तराई पर नीचे देखा कुछ बच्चे खेल रहे थे लगा ये बच्चे डूब जाएंगे मैंने ना कर दी समझाया औरों ने पर मन माना नहीं तब मुझे फिर ये सज़ा मिली जा धूप में मर कल चुपके से जाके हल्की फुहार- सा बरसूंगा आज भय से दुबके बच्चे कल रिमझिम में उछलेगें खेलेगें पर आज मुझे सारा दिन यूँ‌ ही जलना होगा और तब से सोच रहा हूंँ मैं ...
जागना-चेतना-मरना
कविता

जागना-चेतना-मरना

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* जागना संगीत छन रहा हो अँधेरे की जाली से रोशनी के मानिन्द राग. तुम हो जाओ विराग. संगति को रहने दो निर्लिप्त. नादब्रह्म मौन पोर-पोर से अनुभव करो जागने का आनंद I चेतना जिज्ञासा मरती है मायूसी छोड़कर. प्रेम मरता है उदासी छोड़कर. मनुष्य मरता है राख छोड़कर और स्मृतियाँ शून्य. हाँ, तारीखें मरती हैं तारीखें छोड़कर यूँ रिसता है कालपात्र और सबकुछ समा जाता है धरती के रहस्यमय हृदय में. मरना घराना अलग आलापचारी अलग लयकारी अलग आघात की गति और वज़न अलग. फिर भी यह एक ही बंदिश आ रही है अलग-अलग रागों में नए-नए रूप धरकर. अलग भावस्थिति अलग स्वर-रचना शब्दार्थ-गायन का अलग स्वर-विलास अलग विस्तार. मुक्त करो, मुक्त करो खुद को इस बंदिश से अन्यथा मैं मर जाओगे जन्मों तक यूँ ही मरने क...
भंवर
कविता

भंवर

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* एक ऐसे समय में जब काला सूरज ड़ूबता नहीं दिख रहा है और सुर्ख़ सूरज के निकलने की अभी उम्मीद नहीं है एक ऐसे समय में जब यथार्थ गले से नीचे नहीं उतर रहा है और आस्थाएं थूकी न जा पा रही हैं एक ऐसे समय में जब अतीत की श्रेष्ठता का ढ़ोल पीटा जा रहा है और भविष्य अनिश्चित अति असुरक्षित दिख रहा है एक ऐसे समय में जब भ्रमित दिवाःस्वप्नों से हमारी झोली भरी है और पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक रही है एक ऐसे समय में जब लग रहा है कि पूरी दुनिया हमारी पहुंच में है और मुट्ठी से रेत का आख़िरी ज़र्रा भी सरकता सा लग रहा है एक ऐसे समय में जब सिद्ध किया जा रहा है कि यह दुनिया निर्वैकल्पिक है कि इस रात की कोई सुबह नहीं और मुर्गों की बांगों की गूंज भी लगातार माहौल को खदबदा रही है एक ऐसे समय म...
तानाशाह के पास
कविता

तानाशाह के पास

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* अपने वफ़ादार वर्दीधारी सैनिक थे, अपने चुने हुए जन-प्रतिनिधि थे, अपने अमले-चाकर थे, अफ़सर-मुलाज़िम-कारकुन थे, अपनी न्यायपालिका थी, अपने शिक्षा-संस्थान थे जहाँ टैंक खड़े रहते थे और तानाशाही तले जीने की शिक्षा दी जाती थी। पर तानाशाह की सबसे बड़ी ताक़त हिंसक भेड़ियों के झुण्ड जैसी वह भीड़ थी जो तानाशाह के लोगों ने बड़ी मेहनत से तैयार की थी। इसमें समाज के अँधेरे तलछट के लोग थे और सीलन भरे उजाले के पीले-बीमार चेहरों वाले लोग थे और जड़ों से उखड़े हुए सूखे-मुरझाये हुए लोग थे। यह भीड़ तानाशाह के इशारे पर किसीको बोटी-बोटी चबा सकती थी, सड़कों पर उन्माद का उत्पात मचा सकती थी, बस्तियों को खून का दलदल बना सकती थी। सम्मोहित-सी वह भीड़ हमेशा तानाशाह के पीछे चलती थी और तानाशाह के इशारे का इंतज़ार करती थी। त...
जीत जाओगे एक दिन
कविता

जीत जाओगे एक दिन

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* अपनी मुश्किलों से जो लड़ रहे हो तो जीत जाओगे एक दिन! अगर तुम बारीकियों को पकड़ रहे हो तो सीख जाओगे एक दिन !! हौसले से मंजिल पर बढ़ रहे हो तो जीत जाओगे एक दिन !! समय की हवा उस रुख में बहने लगेगी जिस दिशा में तुम होगे ! खुशियों की परछाईयाँ पीछे चलने लगेगीं जिस जगह पे तुम होगे ! साफ नीयत से काम करोगे तो काम भी तुम पर मरेंगे !! अगर ज़मी-आसमां एक कर रहे हो तो जीत जाओगे एक दिन !! ख़ामोशी के संग भी तुम ख़ामोश मत रहना !! हुस्न के नशे में हर दम मदहोश मत रहना !! अपनों को गैर मत करना गैरों से बैर मत करना !!!! हुस्न इक निकासी है आत्मज्ञान सर्वव्यापी है ये बात जो समझ रहे हो तो जीत जाओगे एक दिन ! अपनी मुश्किलों से जो लड़ रहे हो तो जीत जाओगे एक दिन !! परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्...
मैं हूँ ना …
कविता

मैं हूँ ना …

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* जब ज़िंदगी उलझने देती है और सारे दरवाज़े बंद लगते हैं तब दिल सबसे पहले जिस नाम को पुकारता है वो है- ‘पिता’ हर मुश्किल का टोल फ्री नंबर। ना नेटवर्क चाहिए ना कोई बैलेंस ना ही कोई समय तय करना होता है बस एक कॉल दिल से जाता है और उस तरफ से आता है "बोल बेटा, क्या हुआ?" जब जेब खाली हो और सपने भारी जब दुनिया मुंह फेर ले और दोस्त भी न साथ दें तब वो कहते हैं "मैं हूँ ना… तू बस चल" न टाइमटेबल न ही शिकायत की फुर्सत लेकिन फिर भी वो हमेशा अवेलेबल रहते हैं, हर दर्द, हर चिंता के लिए। उनकी आवाज़ में वो जादू है, जो आँसुओं को रोक देता है और उनके कंधे मानो पूरी दुनिया से मज़बूत हैं। "पिता" वो टोल फ्री नंबर है जो कभी व्यस्त नहीं होता जो हर बार जवाब देता है चुपचाप, लेकिन पूरे दिल ...
मौन और संवाद
कविता

मौन और संवाद

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* आज मै फ़िर बैठी हूँ उसी जगह वही समय और वही चांद है मेरे सामने बस तुम कहीं खो गए हो. बादल तो हमारे यहां हल्के हैं इस बरसात में भी शायद तुम्हारे यहां के बादल तुम्हें छिपाकर रोक लिया चांद को दिखाने से कुछ यूं ही हम तुमको सोच रहे हैं. क्या वो मछली स्पर्श कर पाई होगी कमल को या वो वैसे ही बैचेन उद्धत है आज भी चूमने को उस कमल को? नहीं शायद वो घबरा गई होगी मेघों को देख के या कहीं छिप गई होगी उसी कमल के पत्तों में लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि वो दिखें न तो वो होगा ही नहीं बस ऐसे ही घुमड़ रहे हैं कई सवाल जो सिर्फ़ और सिर्फ़ दिमाग़ की उपज हैं. इसलिए कि कुछ प्रश्न उसके अनुसार अनुत्तरित रहते हैं हां सही भी है हर सवालों के जवाब मिल जाए जरूरी तो नहीं. आज फ़िर बैठी हूँ तो उ...
मुझे तुम भूल जाना …
कविता

मुझे तुम भूल जाना …

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* साथ देखा था कभी जो एक तारा आज भी अपनी डगर का वो सहारा आज भी हैं देखते हम तुम उसे पर है हमारे बीच गहरी अश्रु-धारा नाव चिर जर्जर नहीं पतवार कर में किस तरह फिर हो तुम्हारे पास आना। भूल पाओ तो मुझे तुम भूल जाना! सोच लेना पंथ भूला एक राही लख तुम्हारे हाथ में लख की सुराही एक मधु की बूँद पाने के लिए बस रुक गया था भूल जीवन की दिशा ही आज फिर पथ ने पुकारा जा रहा वह कौन जाने अब कहाँ पर हो ठिकाना। भूल पाओ तो मुझे तुम भूल जाना! चाहता है कौन अपना स्वप्न टूटे? चाहता है कौन पथ का साथ छूटे? रूप की अठखेलियाँ किसको न भातीं? चाहता है कौन मन का मीत रूठे? छूटता है साथ सपने टूटते पर क्योंकि दुश्मन प्रेमियों का है ज़माना। भूल पाओ तो मुझे तुम भूल जाना! यदि कभी हम फिर मिले जीवन-डगर पर मैं लिए आँसू, लिए तुम ...
प्रेयसी की पाती
कविता

प्रेयसी की पाती

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* पता है कुछ वक़्त बाद हम साथ नहीं होंगे वक़्त करवट लेगा तो सब बदल जाएगा तुम मेरे न रहोगे और मै शायद रहूंगी ही नहीं. हां मगर मै तुमको तनहा नहीं छोडूंगी तुझ संग सदैव रहेंगी मेरी यादें मेरा वो अटूट प्रेम जो मैंने आजीवन तुमसे किया मेरी श्रद्धा. श्रद्धा जो तुम्हारे प्रेम के लिए थी वो भी सदैव रहेगी मेरी मुस्कुराहट गूंजेगी तुम्हारे अंतर्मन में हमेशा यूं ही मेरी आंखो में तुम्हारा अक्स जो तुम्हे हमेशा दिखाई पड़ता था वो भी तुम्हे आंखे बन्द करके समक्ष दिखाई देगा. जब भी कोई हवा का झौंका तुम्हे छूकर गुजरेगा तुम महसूस करोगे मुझे अपने आस पास हमेशा ही तुम्हारे मन में मेरे गीत हमेशा गुंजायमान रहेंगे माना कि मेरी कोई जायदाद नहीं जो तुमको सौंप जाऊं मै मेरे पास तो बस तुम्हारा प्रेम है ...
आजादी
कविता

आजादी

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* ख़ौफ़ से आज़ादी ही हमारी सच्ची आज़ादी है जिस पर मैं तुम्हारे लिए दावा ठोंकता हूँ मेरी मातृभूमि! पीढ़ियों के बोझ से आज़ादी अपना सिर झुका कर चलते रहना अपनी कमर की हड्डियाँ तोड़ लेना और भविष्य की पुकार पर मूंद लेना अपनी आँखों को नींद की बेड़ियों से चाहिए हमें आज़ादी. जिससे तुम रात के सन्नाटे में ख़ुद को जकड़ लेते हो और उस सितारे पर ज़ाहिर करते हो अपना अविश्वास जो सत्य की साहसिक राहों तक हमें ले जाना चाहता है आज़ादी अपनी क़िस्मत की अराजकता से. जिसकी पालें अंधी और अनिश्चित हवाओं के सामने कमजोर पड़ती जाती हैं और पतवार हमेशा चला जाता है मौत के माफ़िक कठोर और ठंडे हाथों में कठपुतलियों की इस दुनिया में रहने के अपमान से आज़ादी. जहाँ हरकतें बद-दिमाग़ तंत्रिकाओं के ज़रिए शुरू होती हैं नासमझ आ...
जीभर जीकर जाना
कविता

जीभर जीकर जाना

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* खाना-पीना सो जाना बात-बात पर रो जाना. क्या ये है कोई ज़िंदगी यूँ ही मायूस हो जाना. चार दिनों की पूँजी साँसें बेजा इन्हें मत कर जाना. अवसर यह मिला हुआ है इसको जीभर जीकर जाना. विधाता ने बड़े प्यार से धरती घूमन को भेजा है. कुँदन काया सुँदर माया देकर के तुम्हें सहेजा है. अंदर-बाहर भरा उजाला हम सबको राह सुझाते हैं. न जाने किस भरम बावले कोई राह तक न वे पाते हैं. जग जैसा है, वैसा ही है किसलिए है इससे डरना. अकारण न घटती घटना केवल कारण से है बचना. बस इतना है हाथ तुम्हारे खुद की सुधबुध है रखना. है ईश्वर तेरे ही भीतर बैठा जब जी चाहे कर मिलना. बिना विचारे अंधा हो कर काहे कदम उठावे तू प्यारे. खुली आँख से चलने वाला कभी न ठोकर खावे प्यारे. तन- जीवन- जान अभी है फिर क्यों तू घबराए जग...
बौना हुआ ईमान
कविता

बौना हुआ ईमान

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* सारी दुनिया वह कहे जो सम्मत विज्ञान धरती -चपटी मानते अभी बहुत इंसान। अड़े हुए हैं झूठ पर जान -बूझ अंजान अंध-श्रद्धा के सामने बौना हुआ ईमान। इंसाँ -इंंसाँ फर्क कर मज़हब लीने मान कुछ लोगों को छोड़कर सब काफिर शैतान। काफ़िर का जायज़ क़तल क्या यही कहता ज्ञान काफ़िर का कर खात्मा हासिल करो जहान। जो धरती पैदा हुआ वो सब एक समान यहाँ सभी हकदार हैं जीव -जंतु -इंसान। प्रेम -मुहब्बत -मुरब्बत इंसानी पहचान जिस मज़हब ये न रहें वो मज़हब मुर्दा जान। कुछ लोगों को वहम का होने लगा गुमान जो जितना जाहिल दिखे वो मज़हब की शान। परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरवरी निवासी : पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्व...