मानवता
प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे
मंडला, (मध्य प्रदेश)
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मानवता मानव का भूषण, नव समाज निर्माण है।
खुशियों की होती है वर्षा, सतयुग-ओर प्रयाण है।।
सेवा में सद्भाव समाहित, कर्मों का सम्मान है।
सेवा से जीवन की शोभा, मिलता नित यशगान है।।
दीन-दुखी के अश्रु पौंछकर, जो देता है सम्बल।
Pपेट है भूखा,तो दे रोटी, दे सर्दी में कम्बल।।
अंतर्मन में है करुणा तो, मानव गुण की खान है।
सेवा से जीवन की शोभा, मिलता नित यशगान है।।
धन-दौलत मत करो इकट्ठा, कुछ ना पाओगे।
जब आएगा तुम्हें बुलावा, तुम पछताओगे।।
हमको निज कर्त्तव्य निभाकर, पा लेनी पहचान है।
सेवा से जीवन की शोभा, मिलता नित यशगान है।।
शानोशौकत नहीं काम की, चमक-दमक में क्या रक्खा।
वहीं जानता सेवा का फल, जिसने है इसको चक्खा।
देव नहीं, मानव कहलाऊँ, यही आज अरमान है।
सेवा से जीवन की शोभा, मिलता नित यशगान है।।
परिचय :- प्रो. डॉ....

