बासंती दौर
प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे
मंडला, (मध्य प्रदेश)
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सखी ! आज तो भौंरे, कलियों को चूमे।
है पराग की चाह, वनों-उपवन में घूमे।
मन में लिए उमंग, बसंती हवा चल रही,
जिसने पाया मीत, वहीं मस्ती में झूमे।।
आया है ऋतुराज, गीत मौसम के गाता।
सरसों का उल्लास, आज जन-जन को भाता।
वन-उपवन हैं दिव्य, कछारों में है यौवन,
मिलन-नेह का भाव, गीत अभिसारी गाता।।
कामदेव का ताप, आज बौराया हर इक।
अनुबंधों का दौर, पहुँच वासंती मन तक।
टूटे संयम बंध, सभी तो हैं अब विचलित,
है प्रियवर की चाह, सभी के दिल में धक-धक।।
पीत वसन की आभ, सजी है अब अमराई।
कोयल ने मादक होकर के, प्रीति जगाई।
अब युवाओं की बात, अकेले मात्र नहीं है,
ढूंढ रहे हैं मीत वृद्ध भी, हो हरजाई।।
हुईं दूरियाँ ख़त्म, वसंती मौसम चहके।
परिणय की है बात, मिलन के पल हैं महके।
है गृहस्थ की बात, नहीं अब केवल जानो,
तोड़ के संयम...

