वो थे इसलिए….
राजेन्द्र लाहिरी
पामगढ़ (छत्तीसगढ़)
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प्रकृति ने पैदा किया इस धरती में जरूर,
इंसान होकर भी इंसान नहीं बन पाये
क्योंकि कुछ लोगों को था जाति का सुरूर,
था उस सनक में इतना ज्यादा घमंड,
अमानवीय अत्याचार करते थे प्रचंड,
वो रहने को तो मुट्ठी भर थे,
पर अपने लाभ के लिए सदा प्रखर थे,
जिनके लिए जरूरी था साम, दाम, दंड, भेद,
हत्या जैसे अपराध पर थे नहीं जताते खेद,
था सबके लिए जरुरी उनकी हंसी,
सब त्याग देते थे मन में उमड़ी खुशी,
ऐसा नहीं है कि किसी ने
उनकी करतूत किसी को बताया नहीं,
जाल में उलझे लोगों ने जिसे समझ पाया नहीं,
उनका प्रमुख काम था स्वयं पढ़ना,
उलझाये रखने के लिए कथाएं गढ़ना,
सब पड़े थे जैसे हो आदिमानव,
मिथकों को तोड़ने आया एक महामानव,
सारे विरोधों के बाद भी जिसने भरपूर पढ़ा,
मानवता के लिए जिसने संविधान गढ़ा,
महाग्रंथ में जिसने लिख डाले
इंसा...

