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Tag: ललित शर्मा

सहयात्री
कविता

सहयात्री

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** बस, रेल, टेक्सी और हवाई जहाज गूंजती चहुंओर, यात्रियों की आवाज, हर तरफ खचाखच भीड़-भाड़, बेशुमार करते जल्दबाजी यात्री, हो जाते सवार स्टेशन, बस अड्डे, हल्ला-गुल्ला और शोर निर्धारित स्थान में पहुंचने की लगती होड़, हाथ में, तो कंधे में ले कीमती सामान दौड़-भाग में घिर, यात्रा बनाते आसान अकेले में, समूह में, सपरिवार संग, कोई बेसहारा, कोई असहाय निर्धन, यात्रा करते करते, जीत लेते यात्री मन मेल-मिलाप कर लेते यात्री खूब व्यापक दुःख-दर्द छँटकर खुशी बढ़ती व्यापक बातों ही बातों में दूर हो जाता, संकोच मनोबल बढ़ता शर्म खुलती निसंकोच बढ़ती यात्रियों में दुगनी नई उमंग सोच यात्री बन जाता घुलमिलकर सहयात्री लम्बी यात्रा का आनंद उठाते सहयात्री खुशनुमा आंनद भरा गहरा आनन्द पाते एक दूसरे बनते पूरक, घनिष्ठता बढ़ाते सहयात्री का सुहा...
एक भूखा प्यासा मजदूर
कविता

एक भूखा प्यासा मजदूर

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** कामकाज में चतुर दक्ष एक भूखा प्यासा मजदूर निकला उपार्जन की तलाश में, सुबह से शाम तक घूमता फिरता रोजगार और काम की तलाश में, बस खड़ा चौराहे पर अपने औजार हथियार संग निरखकर कह रहा अंर्तमन में भूख से कराहता, बोला खुद से, भूखे पेट निकला हूँ मजदूरी करूं, उपार्जन करूँ बैचैन भूख से हूँ, सिर में चक्कर फिर भी काम के चक्कर में विश्राम कैसे करूँ, काम के तलाश में अडिग खड़ा हूँ, मिल जाये मेहनत की मजदूरी बस निकला हूँ भुख मिटा दूं,सबकी निकला हूँ काम से,घर घर काम करूं उपार्जन करूँ परिवार का पेट भरूँ खून पसीना बहाकर, दिनभर की थकावट में काम करूँ, भूखे बिलखते पीड़ित बच्चों का दुःख दर्द बस, दूर करूँ अचानक मजदूर की, दुर्दशा को देख स्वार्थी पूछकर, कहने लगा आधे पैसे ले लो, मजदूरी आधी ले लो निबटा दो समूचा काम, भूख त...
गुरुजनों की याद आती वाणी
कविता

गुरुजनों की याद आती वाणी

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** बचपन में पढ़ते वक्त, गुरूजी रहते रोज साथ कहते थे, पढोगे मन से, जीवनभर रहेगी बातें याद।। गुरुजी के मुखारबिंद से निकलते है ज्ञान के अनमोल वचन, ज्ञान की घुंटी पिलाकर सुनते रहे गुरूवचन बचपन के दिन याद करें याद आते अनमोल वचन, बच्चो सदैव याद रखना अनमोल महानवचन, गुरुजन के आजीवन अनमोलवचन ये है सच्चे धन, आते है याद, कहते रहे गुरुजी, भूलना कभी नहीं ज्ञान की मूलबात, हमेशा संग रखना अनमोल बात अटके जब जीवन में जब कोई काज करना लेना गुरुजी की बातें दिल से याद, विपत्ति में गुरुदेव की हो न हो आती है कही बात की याद, कहते सदैव गुरुजी, माता पिता, गुरुजनों परिवारजनों कुटुम्बजनों, और आत्मीयजनों से सदैव बनाये रखो प्रेम सदभाव व्यवहार और रखना सदैव आपसी अपनापन, स्नेहप्यार, मुलाकात बनाये रखो ऐसे मजबूत रिश्ते, अनुभव...
पर्यावरण पर प्रहार
कविता

पर्यावरण पर प्रहार

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** मत करो प्रकृति पर प्रदूषण से प्रहार, करो मत प्रदूषण से मोहमाया, न बनो मित्र, यार प्रकृति पर भरती जख्म प्रदूषण कितना बुरा कितना बदरंग पर्यावरण पर प्रहार से प्रकृति की स्वच्छता में हरियाली साफ गुल वायुमंडल पर प्रदूषण का तेजतर्रार तीखा हमला, प्रकृति में प्रदूषण का घुलता खतरनाक विषैला जहर वृहत दमघोंटू प्रदूषण परिवार में जानलेवा नाशक जहर, नष्ट करता जीवन क्यों फिर प्रदूषण को खुला निमंत्रण, घनिष्टता फिर क्यों ? सचेतक फिर भी नहीं, क्यों ? शुद्ध पर्यावरण की चाहत जीवन जीने में, जागरूक फिर भी नहीं क्यों ? जागना तो होगा आज नहीं तो कल थाम लो प्रदूषण का खतरा, वरना जीवन सुरक्षित बचेगा न आज फिर आने वाले कल परिचय :- ललित शर्मा निवासी : खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) संप्रति : वरिष्ठ पत्रकार व लेखक...
गहरे बन जाते रिश्ते
कविता

गहरे बन जाते रिश्ते

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** रिश्ते अपने हैं या पराये पर ये रिश्ते ही रिश्ते की सशक्त डोर बनकर सच्चे गहरे रिश्ते बन जाते है। कब कहाँ कैसे किस मौड़पर कौन अपना बन जाये बस मिलकर रिश्ते बन जाते है न जाने यह किस अदृश्य चमत्कारी शक्ति का परिणाम रिश्ते की सशक्त सच्ची डोर सख्त बनाते है ये रिश्ते ही अपनों से अपनों के टूटकर बिछुड़कर दरकिनार हो जाते हैं, खून के रिश्ते अपने बनकर भी अपने से अपनापन के सगे रक्त के रिश्ते रहकर भी अपनापन का अहसास भाव अक्सर निभा नहीं पाते हैं। किसी अनजान गली मोहल्लों में किसी गांव से शहर में किसी महफ़िल, सभाओं, यात्रा में, किसी भी अनजान जगहों में खून के गहरे संबंध से गहरे रिश्ते बेजोड़ बबनाकर क्या खूब लोग बखूबी रिश्ते की परिभाषा निभाते रिश्ते का सच्चा अर्थ बताते हैं। रिश्ते में सच्चाई स्नेह प्रेम ममत्...
वो जगह सुहानी
कविता

वो जगह सुहानी

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** वो जगह जहां बचपन में खेलते-कूदते वो जगह जहां भेदभावपूर्ण मस्त रहते वो क्या दिन थे आपस में सँगठित रहते वो क्या हंसी खुशी थी जो अतुलनीय थी कितना अपनापन था परायापन का अहसास तक नहीं होता वो जगह गांव की थी क्या राजा क्या महाराजा क्या जनता जहां आदर प्रेम का संसार दीखता वो जगह जहां एक पोखरा था वो जगह जहाँ प्रेमबन्धन था नाचते, कूदते, खेलते पोखरा के पानी में आंनद की डुबकियाँ में खेलते बचपन के आंसू भी भरपूरन आंनद से आनंदित लगते वो जगह जहां एकजुटता में एकजुट की बातें करते दुःख-सुख की घड़ियां आती वो जगह जहां सब अकेले नहीं रहते वो जगह जहां दुखद घड़ी में सहारा बनते वो जगह जहां हर एक दूसरे का सहारा रहते परिचय :- ललित शर्मा निवासी : खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) संप्रति : वरिष्ठ पत्रकार व लेखक घोषणा पत...
भाग्यविधाता
कविता

भाग्यविधाता

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** पांच वर्ष में मतदान होता लोकतंत्र को मजबूत करता मजबूत करने का महापर्व मतदाता को इसपर खूब गर्व ।।१।। भारी उत्सकुता से आता मतदान की कतार लगाता मतदान केंद्र में मतदाता मतदान कर लौट जाता ।।२।। मतदान कर नहीं बताता निर्णय अकेले दे जाता मतदानकेंद्र में सीधे आता मत का अधिकार बताता ।।३।। मतदान केंन्द्र सज जाता चुनाव अधिकारी डटजाता मतदान की नींव बनाता बारी बारी से सबको बुलाता ।।४।। बारिकी में चुनावअधिकारी हिसाब में रखता होशियारी चुनाव परिणाम की करता कागज कलम से तैयारी ।।५।। एक एक मत का हिसाब देते अधिकारीबखूब जबाव निष्पक्षता बरतते लाजबाव मत हो न जाये खराब ।।६।। मतदाता का मतदान कितना होता कीमती असरदार बन जाता कितना होता महान मतदाता ही निर्णायक मुख्यभूमिका निभाता ।।७।। खुलता है जब मतपेटी भाग्...
जीवन की लीला
कविता

जीवन की लीला

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** जीवन का खेल है खूब निराला अमृत म घुलता विष का प्याला कहीं अमृत का लाजबाव स्वाद निस्वार्थी का वही महाप्रसाद ।।१।। सांस जबतक, आस तबतक ईश्वर की भक्ति है जप और तप ।।२।। स्वार्थ का भरता जीवन संसार भ्रमित क्यों करो त्वरित दरकिनार जीवन जब अविराम चलती गाड़ी असीम आंनद, सच्ची होती खाड़ी ।।३।। राह पाने में बने जो स्वर्थी खिलाड़ी भ्रमित भाषा में कहे, है वो अनाड़ी।।४।। राह को मतलबी जीवन क्यों बनाते जीवन में स्वयं रोढ़ा, दिख आते दुख वेदनाओं का ज्ञान समझ पाते जीवनसंसार की लीला समझ जाते ।।५।। कामक्रोध लोभमोह की मौजमस्ती जीवन में बन जाती है हरदम सस्ती उदारता त्याग सेवाभाव करुणाप्यार यहीजीवनसाथी, यही सच्चा संसार।।६।। परिचय :- ललित शर्मा निवासी : खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) संप्रति : वरिष्ठ पत्रकार व लेखक घोषणा पत्...
बिन पते का पत्ता
कविता

बिन पते का पत्ता

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** हरा-भरा, नीला-पीला पेड़ की डाली का मैं बस पत्ता कहलाता हूँ, तना, डालियों, शाखाओं का मामूली सा रंगबिरंगी पत्ता, पेड़ की स्वाभिमान बढ़ाता हूँ पेड़ का जीवनसाथी बनकर मैं तो मामूली पत्ता कहलाता हूँ, पेड़ की रौनक क्या है प्रकृति की रौनक क्या है, चार चांद लगाने आता हूँ, मैं मामूली सा पत्ता कहलाता हूँ, हरियाली को हरदम हरा भरा खिलाता हूँ, मैं प्रकृति की आज्ञा से पहले पेड़ की डाली में आ नहीं पाता हूँ हरा-भरा खिलाखिला मुर्झाता छोड़ चला जाता हूँ, हवा आंधी तूफान का भरोसा नहीं कर पाता हूँ अस्तव्यस्त प्रकृति में हरा भरा सा खुशहाल बेहाल बनकर तमाशा सा जमीन पर उतर आता हूँ अस्तित्वहीन, मूकदर्शक निर्जीव मुर्झाया मृत सा न जाने कहाँ कौन सी दिशा में दूर दर-दर की ठोकरों में जमीन के कण-कण में समय चक्र की भांति कालचक...
वाककला जीवन की प्रगति के मोड़ में भरती मुस्कान
आलेख

वाककला जीवन की प्रगति के मोड़ में भरती मुस्कान

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** इंसान कलाओं के भंडार में पारंगत है। वह उपयोग कहां कब किस तरीके से कला को दर्शाता है उसका निखार लाता है यह व्यक्ति का व्यक्तिगत विषय है। इसमें व्यक्ति का व्यक्तित्व साफ झलकता है । कला का रूप प्रत्यक्ष होता है। व्यक्ति अपनी प्रतिभा का परिचय देने में सक्षम संबल होता है। अपने अंदर छुपी कला कब कहां किस रूप में उभारता है यह अपनेआप में पेचीदा प्रश्न है। यह जरूर है कि अवसर सुअवसर में श्रोता ही कला का निर्णयकारी सहित मूल्यांकन करता है। यकीनन मानिए तालियां की गड़गड़ाहट में वाक कला प्रमाणित करती है कि वक्ता के भावनात्मक विचार श्रोताओं के ह्र्दयमन में स्पर्श कर गए है। व्यक्ति की प्रतिभा औऱ उसकी कला जब प्रकट होती है तो वह निश्चित चर्चित होती है। यह बयां करती है कि वाक कला में पारंगत है। इंसान वाक कला कौशलता में बोलकर खरा उतरता है। वाक कला ...
बदलते युग का शोर
कविता

बदलते युग का शोर

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** आधुनिक युग नया दौर चहुँऔर मचा खूब शोर, कहीं तारीफ का बजता ढोल बिगुल कहीं नजरअंदाज करने में है गुल, तकरार आमने आमने पुरजोर घमासान जंग में दुर्बल को मिटाने में प्रतियोगिता में मचा शोर, भारी भरकम मची दौड़ मेहनत पर फेरकर पानी करने को लगाते जोर मजबूत साख मिटाने में लगाए जोर करते कमजोर, बदलते आधुनिक युग में बस मचाते बस, यही शोर बदलते समय यही सोच में, बदले बोलने के व्यवहार संग इंसान अब इंसान से प्रश्न पूछने और सोचने को कहाँ है संस्कार संस्कृति उच्च विचार, सोचता इंसान क्या करूँ, कैसे करूँ नम नेत्र से एकांत बैठे बदलते आधुनिक युग में भीतरघात की वेदनाओं में, सच्चाई बताने में कमजोर सौहार्द समन्वय भाईचारे में पतन की डोर जाने कितनी हो रही बदलते युग मे कमजोर परिचय :- ललित शर्मा निवासी : खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (अस...
हिंदी दिलाती पहचान
कविता

हिंदी दिलाती पहचान

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** विश्व हिंदी दिवस १० जनवरी २०२६ पर आयोजित कविता लिखो प्रतियोगिता में सम्मिलित रचना विश्वभर में हिंदी दिलाती है हमसबको हिंदी से सम्मान आओ करें हिंदी का गुणगान काम करें हिंदी में, करें सम्मान कामकाज में रखें साथ, हिंदी में अनुवाद हरकाम में हरवक्त बोले लिखें हिंदी साहित्य कला संस्कृति को निखारने में हिंदी निभाती योगदान विश्वभर में भाषा हिंदी हमारी बढ़ाती है पहचान आओ मिलकर करे गुणगान बढ़ाये विश्वभर में हिंदी का सम्मान परिचय :- ललित शर्मा निवासी : खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) संप्रति : वरिष्ठ पत्रकार व लेखक घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। प्रिय मित्र, शुभचिंतक एवं परिवारजन आप सभी को नववर्ष पर हार्दिक शुभकामनाएँ। आशा है इस ...
आओ मनाएं मकर सक्रांति
कविता

आओ मनाएं मकर सक्रांति

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** पौष जाए माघ आए शीत की छटा बह आये मकर सक्रांति पर खुशियाँ घर घर आये।। घरपरिवार में तिल गुड़ चिड़वा मुड़ी लाये मकरसक्रांति पर्व की खुशियाँ तनमनमे छाए।। मकर सक्रांति पर्व है ऐसा दान धर्म स्नान भाये वस्त्र अन्न बर्तन कम्बल का दानपुण्य बढ़ जाए।। तीर्थों में आनाजाना, मकर सक्रंति पर्व बताये भारतवर्ष के हर कोने में, मकरसक्रांति मनाए।। नदियां कुंड तालाब पोखरे में ठंडे जल से नहाए मकर सक्रांति पर्व की परंपरा की रीत निभाए।। दही चिड़वा घेवर खानपान में आनंद खूब लाये एक संग में शीत की लहर में अलाव को जलाए।। आसमान की रौनक चारो तरफ यह पर्व महकाये रंग बिरंगी लाखों पतंगों को उड़ाने की मस्ती लाये।। मकर सक्रांति माघ महीने का है दान धर्म का पर्व परंपरा को परम्परागत निभाये, सन्देश सब फैलाये।। आओ हम सभी प्रेमपूर्वक मकर सक...
प्रकृति
कविता

प्रकृति

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** प्रकृति में बनकर वर्षा, हरी भरी लाली चमत्कारी प्रकृति में, बरसाती हरियाली अमृत बनकर प्रकृति को कर तृप्त सूखे से प्रकृति की प्यास, बुझाती बचाती ।।१।। प्रकृति स्वयं प्रक्रिया में करतीऋतु में वर्षा प्रकृति में कीमती उपहार लगती,अमृत वर्षा मौसम में बिन कहे आसमान से जमीन पर आंनद में प्रकृति को खूब, भिगोती है वर्षा ।।२।। प्रकृति की एक मूल आधार, मनमोहक वर्षा घनघोर घटा में उमड़ती है आसमान से वर्षा टपकती जल की असनान से बूंदे बनती वर्षा प्रकृति करती इंतजार अब आओ बरसो वर्षा ।।३।। प्रचंड, तपती, चिलचिलाती, भीषण गर्मी में असहनीय प्रकृति में मानव पशुपक्षी जीवजंतु खेत खलिहान होती जमीन वीरान सुनसान में प्रकृति से जोरशोर प्रार्थनाएं की जाती वर्षा की, ।।४।। झुलसाये, मुर्झाये प्रकृति के पेड़ पौधे की पुकार जीव जंतुओं प्राण...
आदर्श पथ पर चलना
कविता

आदर्श पथ पर चलना

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** आदर्श से रहना आदर्श का पालन करना आदर्शों से सूखी जीवन पथ को चुनना ।।१।। विकट परिस्थितियों में संयम बरतना मन मस्तिष्क नियंत्रित रख आदर्श रखना ।।२।। आदर्श एक महाशक्ति जिसपर रखो दृष्टि यह मानवीय मूल्यों की, उत्तम श्रेष्ट शक्ति ।।३।। हमेशा ही लक्ष्य प्राप्तियों में आदर्श है सूचक यह पथ अपनाकर कहलाता, प्रगति का सूचक ।।४।। आदर्शों से मिलती शान्ति आदर्शों से क्रांति दुःखों की दीवारों में आदर्शों मिलती शान्ति ।।५।। बचपन से आदर्शों का पाठ पढ़कर बीता पल आजीवन खुशियां लाता है हर दिन हर पल ।।६।। आदर्श के पथ से जब जो भी कही डगमगाया उसपर संकट का बादल किन्हीं रूप में आया ।।७।। प्रण करता चलूंगा आदर्श पथ पर बढूंगा आगे आदर्श का महत्व समझ वैसे व्यक्ति आते आगे ।।८।। परिचय :- ललित शर्मा निवासी : खलिहामारी, डिब्र...
आत्मीयता का उपहार
कविता

आत्मीयता का उपहार

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** छोड़कर धन दौलत हार तनमन से बांटो आत्मीयता का अनमोल उपहार ना सोना, ना चांदी, ना आभूषण का कहलाता है सच्चा उपहार, तनमन से बांटो आत्मीयता के प्रेमबन्धन का फूलों की महकती खुशबू सा अपनापन का बांटो अपनों में अपनत्व का अनमोल उपहार जन्मदिन, वर्षगांठ पर दिखावटी आडम्बर से भरे क्या सचमुच कहलाते अनमोल उपहार ? स्वेच्छा से बांटो अनमोल आत्मीयता का सच्चा समन्वय का आत्मीयता से भरा प्रेमबन्धन का अपनो में अनमोल उपहार परिचय :- ललित शर्मा निवासी : खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) संप्रति : वरिष्ठ पत्रकार व लेखक घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।...
अपना घर का सपना
कविता

अपना घर का सपना

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** मेरा अपना आलीशान बंगला है नहीं बड़ी आलीशान इमारत भी है नहीं कहीं कोई बड़ी कोठी भी नसीब है नहीं न कहीं कोई है बड़ी ऊंची हवेली है नहीं, मेरा कहने को है घर कहता हूँ चाव से गर्व से अपना घर घर मकान बस है कच्ची झोंपड़ी का है बना सबको गर्व से कहता हूँ अपना घर, टपकता है घर की चहारदीवारी छत में, बरसात का पानी बाढ़ में जलमग्न हो जाता हफ्तेभर जलमग्न की रहती कहानी, जीवनभर, आंधी बरसात में छत घर की उड़ा ले जाता हर बार कहना चाहता हूँ घर बना नहीं पाता, कहता हूँ फिर भी उसे ही अपना घर, आंनद में रम जाता, सपना मन में हर बार आता सच कभी सपना, कर नहीं पाता मेहमान का आवभगत घर की हालात से कभी कर नहीं पाता बारिश में टप-टप बून्द में भीग जाता तेज गर्मी घूप से बैचैन ओलावृष्टि में घर हर बार टूटकर बिखरकर धाराशायी हो जाता, उ...
बदलता परिवार
कविता

बदलता परिवार

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** एक-एक सदस्य से कहलाता परिवार परिवार की सदस्यता बिना, सुना संसार कहीं भी रहे, कहीं भी बसे, भुलाये भूल नहीं सकते, परिवारजनों को, अक्सर उनके संग ही लगता है, अपना प्यारा कितना अनूठा है परिवार।।१।। कभी किसी जमाने में आन बान शान में संयुक्त परिवार एक जगह सोते रहते खाते पीते मिल-जुलकर हाथ बंटाते सारे काम कर लेते आसान दुःख सुख की नैया चलाने लेते सबजन आपस में हाथ थाम।।२।। संयुक परिवार की असली शक्ति लुटाते उस परिवार पर अपनी जान बदलती दुनिया में बदलते गए है विचार कहीं भी देखो, दिखलाई नहीं देता खुशहाल संयुक्त परिवार, युगपरिवर्तन में सब, अब दीखता एकल परिवार।।३।। परिवार से मिलती खुशियां परिवार से मिलता प्यार एकता का सूत्र बंधा रखता भरापूरा स्नेहभरा परिवार।।४।। परिचय :- ललित शर्मा निवासी : खल...
हिंदी से लगाव
कविता

हिंदी से लगाव

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** मैं रोज हिंदी में बोलता हूँ रोज हिंदी के नए शब्द ही लिखता हूँ रोज में हिंदी ही रुचि से पढ़ता हूँ अनुवाद सिर्फ हिंदी में करता हूँ गद्य पद्य हिंदी में रोज लिखता हूँ हिंदी भाषा का ज्ञान लिखने पढ़ने में रोज व्यवहारित करता हूँ लेखकों कवियों रचनाकारो की रोज नवीन पुरानी अनमोल पुस्तकें सुबह से शाम फुर्सत में रोज संग्रह करता हूँ फुर्सत में रुचिकर रचित ज्ञान अन्तर्मन से पढ़ लेता हूँ रोज नए नए रोचक ज्ञान की खुराक पढ़कर लिखकर अनमोल ज्ञान से तृप्त हो लेता हूँ हिंदी की पुस्तकों का भरपूर खजाना उनका एक-एक पन्ना मन मस्तिष्क में भर लेता हूँ हिंदी की पुस्तकों से रोज असीमित ज्ञान के भंडार को रोज प्रेम से भर लेता हूँ यही है पूंजी सँजोकर रोज सुरक्षित रखता हूँ हिंदी की गहराई में खुशियों को ही नहीं सबके बीच हिंदी ज...
हिंदी ज्ञान का महारथ
कविता

हिंदी ज्ञान का महारथ

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** भाषाज्ञान से सबका सन्मान हिंदी को बढ़ाए रचाये सीखकर अर्जित करें हिंदी लिखने पढ़ने बोलने का ज्ञान ।।१।। जो है करता, भाषा हिंदी का सन्मान, मनमस्तिष्क में हिंदी कविता साहित्य जगत का, तनमन से रचाकर दिलाती खूब सन्मान ।।२।। वही खूब है रचता हिन्दीभाषा लेखन में शक्तिशाली शब्द भरकर अलंकार हिंदी भाषा के समृद्धि में हिंदी के भरता शब्दरस काम हिंदी में करता हिंदीभाषा का गुणगान कर बीज अंकुरित हिंदी का करता ।।३।। हिंदी भाषा का साहित्य जगत में बढ़ता जाए संसार शब्द भाषा से हिंदी भाषा का जन जन तक फलता फूलता जाए सुदृढ़ समृद्ध हिंदी महारथ का संसार ।।४।। मिले मौका लेखनशैली का हिंदी में, नियमित सूंदर सूंदर रचकर अलंकृत शब्द भरो खजाना रचना और शब्द भाषा ज्ञान हिंदी का हिंदी को करो अलंकृत भाषा में पीओ हिंदी...
कुदरत की महिमा
कविता

कुदरत की महिमा

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** कुदरत तेरी रचना वाह तेरा क्या खूब कहना प्राणी जीवजन्तु में कमोधिक गुणों में गुण की बसती महिमा खूबसूरत सुंदर रहती विद्यमान कुदरत तेरी रचना ।।१।। कलम, काठ, पेंसिल स्याही, चाक, लिखावट में गुणी पुस्तकें ज्ञान बढाने, पढ़ाने में रहती है हरदम गुण में गुणी डस्टर बार बार लिखावटों को मिटाने में रहता गुणी निर्जीव सजीव में कुदरत तेरी रची है अजीब रचना प्राणी जीवजन्तु गुणों में गुणी कुदरत तेरी रचना ।।२।। केंचुएं में जमीन उपजाऊ का गुण चूहा, जहरीला कीड़ा उगती फसल नष्ट का रखता गुण हिंसक नीचे गिराने सेवक रखता उठाने गुणों में गुण कुदरत तेरी रचना कुदरत तेरी रचना कहीं बाधक का गुण कहीं सम्मान का गुण मुश्किल है कुदरती रहस्य मुश्किल तेरी महिमा समझना ।।३।। परिचय :- ललित शर्मा निवासी : खलिहामारी, डिब्रू...
बस मन से लिखूं
कविता

बस मन से लिखूं

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** सुबह जागते ही आते ख्याल दिनभर कुछ लिखूं सोचकर समझकर लिखकर सचेत सबको करूँ, क्या लिखूं, कैसा लिखूं लिखकर ना कागज में रखूं लिफाफे में बंद कर ना रखूं, मनगढ़त चुभती बातें ना लिखूं मन के उपजे सवालों में, लिखकर विचारों से, जीवन का सार बदल दूँ,।। कभी घर में, कभी बाहर कभी जमीन में, कभी आसमां में, झांकता हूँ, सोचता हूँ, समझता हूं, उत्साहित, उदासीन मन को लगता है मुझे चुप क्यों फिर रहूँ, लिखने की शक्ति भरूँ इनपर भी मन की बातों का मन को स्पर्श करने सा मनभावन विचार क्यों न मन से लिखूं।। देश, समाज, जाति, की बातें मन में कैसे रखूं, मन करता है हर रोज मुसीबतों में भी मुसीबतों से लड़ने की बेधड़क मन की उपजी बातों को कलम से कागज में अविराम एकांत लिखूं।। परिचय :- ललित शर्मा निवासी : खलिहामारी, ड...
सावन का सुहावना झूला
कविता

सावन का सुहावना झूला

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** आता है सावन जब, मल्हार गीतों से गूंजती बहार सावन की हरी भरी हरियाली में, गूंजे गीतों की बहार ।।१।। सावन के सुरीले गीतों की मस्ती में, आंनद की बहार नवविवाहित सजती श्रावण में, करती सोलह श्रृंगार ।।२।। भगवान कृष्ण और राधा का सजता, सावन में दरबार श्रद्धालुओं की लंबी लंबी लग जाती, मंदिरों में कतार ।।३।। ब्रज में बुरा सेवन की परंपरा, दामाद आने की बहार सावन में ससुराल वाले, दामाद का करते इंतजार ।।४।। सावन में ठाकुरजी की आकर्षित लगती, सुंदर पोशाक दौड़े दौड़े आते भक्त, पहनाते बेबाकमनमोहक पोशाक।।५।। ब्रज रस में सावन का सुहावना, सुंदरता से सजा झूला कृष्ण राधा की युगल जोड़ी में, मधुरतम लगता झूला ।।६।। सावन में संस्कृतिसाहित्य की समृद्ध, नजर आती कला जिधर देखो सुनहरी छटा में सुंदर, ब्रज का सावन मेला ।।७।। चौरासीक...
भूल रहे घरेलू कला कौशलता
कविता

भूल रहे घरेलू कला कौशलता

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** न जाने क्यों किन कारण से दिन प्रतिदिन बदल गये अधुनिकता के रंग में ढल गए नए रंगरूप में उमंग-तरंग में चढ़ गए घरेलू कला कौशलता के नुस्खे भूल गए आधुनिकता में बेसुमार रम गए घर की रसोईघर में भोजन पकाने में मिट्टी के सुंदर टिकाऊ चूल्हे धुंए की लोहे की फुँकनी मिट्टी के बने मनमोहक घड़े तांबे पीतल के बने बर्तन मसाले कूटने के मामजस्ते काठ के बने चकले बेलन कांच के अचार रखने के व्याम अनेकों सामानों को अकारण उन्हें भूल गए पकाने की पद्धति में न जाने कितने पिछड़ गए पौष्टिक आहार बनाने में शिथिल पड़ गए भोजनालय की सारी पद्धति भूल गए घरेलू स्वादिष्ट भोजन छोड़ बाहर के स्वाद चखने में बेधड़क रम गए न जाने क्यों घरेलू कला कौशलता अधुनिकता के चक्कर में भूल रहे आधुनिकता के गहराइयों में बेहिसाब गहरे रम गए परिचय...
पतंगबाजी
कविता

पतंगबाजी

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** हाथ में चरखी, चरखी में लिपटा धागा, चौकोर कागज की रंगीन पतंग हवा की मस्ती की लहरों में उड़ाता उड़ाने की ख़ुशी में सबसे हर्ष आनंद बढ़ाता सेहत बढ़ती, मिलती ताजी धूप प्रफ़ुल्लित मनमस्त हो चला जाता खुले वातावरण में चरखी औऱ डोर घुमाता कागज की सुंदर रंगीन पतंग आकाश में देख, ह्रदय खूब हर्षाता फेफड़ों में लाभकारी पतंग से खुशियाँ भारी पाता अच्छा ब्रीडिंग व्यायाम करता भारी ऑक्सीजन पर्याप्त मिलता ताकत भारी पतंगबाजी में करता प्रकृति से शरीर की प्रक्रिया नजरें प्रकृति से लड़ती लड़ता मन खुशियां मिलती न्यारी आसमान में उड़ाकर रंगीन पतंगों को रोगमुक्त का उपाय पतंग उड़ाकर मन को बढे चाव शरीर की पीड़ा जटिल रोग दूर होती पतंगबाजी से अनेक बीमारी एकाग्रता बनाए रख उड़ाए पतंग उड़ाए पतंग भगाओ परेशानी पतंग उड़ाने...