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नशा छा जाता

अंजनी कुमार चतुर्वेदी
निवाड़ी (मध्य प्रदेश)
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जिसके सेवन से मानव पर,
त्वरित नशा छा जाता।
ऐसा मादक द्रव्य देह को,
ही समूह खा जाता।

नशा नाश की जड़ है प्यारे,
नशा नर्क का द्वार है।
डूबा रहता जो व्यसनों में,
नष्ट हुआ घर-बार है।

बुद्धि भ्रष्ट हो जाती इससे,
पतन आत्मा का होता।
जैसे नाव डुबो देता है,
हुआ तली में जो सोता।

सभी मान मर्यादा खोता,
व्यसन चाहने वाला।
आयँ-बायँ बकने लगता है,
गई हलक में हाला।

बीड़ी, सिगरेट, तम्बाकू या,
चरस अफीम औ गाँजा।
करता है जो व्यसन हमेशा,
उसका बजता बाजा।

गाँजा, चरस, भांग, हेरोइन,
ब्राउन शुगर जो लेता।
सुरासुंदरी के घेरे में,
तन- धन ही खो देता।

नशा माफ न करे किसी को,
व्यसन यही सिखलाता।
नशा रक्त में मिलकर अपना,
रौद्र रूप दिखलाता।

व्यसनी अपना हित अनहित भी,
कभी देख न पाता।
अपने अवगुण के कारण ही,
घर का खोज मिटाता।

घर परिवार ठोकरें खाता,
तिरस्कार सहता है।
चलता, फिरता पीता, खाता,
सिर नीचा रहता है।

स्वयं मान सम्मान मिटाता,
धन-संपत्ति बिक जाती।
परिजन, पुरजन साथ छोड़ते,
फिर भी लत न जाती।

जब जागे तब हुआ सवेरा,
व्यसनों को तुम छोड़ो,
अटल प्रतिज्ञा बरगद जैसी,
प्रभु से नाता जोड़ो।

दिन का भूला अगर शाम को,
अपने घर आ जाता।
उजड़ा चमन महकने लगता,
फिर बसंत छा जाता।

परिचय :अंजनी कुमार चतुर्वेदी
निवासी : निवाड़ी (मध्य प्रदेश)
शिक्षा : एम.एस.सी एम.एड स्वर्ण पदक प्राप्त
सम्प्रति : वरिष्ठ व्याख्याता शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय क्रमांक २ निवाड़ी
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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