
छत्र छाजेड़ “फक्कड़”
आनंद विहार (दिल्ली)
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मैं
और सामने अडिग खड़ी
सुदृढ़ लाल किले की सी
तनी प्राचीर मेरी “मैं” की
बैठे हैं
इस पर अनेकों उल्लू
भांति भांति के रूप धरे
क्रोध… मान… माया… लोभ…
विकसित हैं
गहरे काम तंतु
सोने पे सुहागा
पालती है इन सब को
शक्तिमान ये “मैं”….
अनचाहे इन उल्लूओं की
जमी है गिद्ध दृष्टि
मेरी इस ” मैं ” पर
उलझ कर
भ्रमित करती हवाओं से
मन
उड़ने लगता है पवन वेग से
चढ कर लिप्सा के
हवाई घोड़े पर
बढती जाती है
असीमित कामनाएँ
उद्वेग उठता
महत्वाकांक्षाओं का
मन
गिरने लगता है
वासना के अंधकूप में
और
सच्चाई घुल बह गई
नयनों के काजल में
अच्छाई दब गई
दर्प की झीनी चादर में
मति भ्रष्ट हो गई
विषय विकार के दलदल में
गुम गया मन
भौतिकता की चकाचौंध में
फिर
हो गया लौटना नामुमकिन
वापस मन का
कल्याण कहाँ
पथभ्रष्ट मन का
अनेकों प्रयास के बाद भी
हो नही पाता मन एकाग्र
कैसे संतुलित हो जीवन समग्र
प्रश्न यूँ का यूँ खड़ा है
कैसे निस्तारण हो मन का
मेरी अपनी ही “मैं” से….!
परिचय :- छत्र छाजेड़ “फक्कड़”
निवासी : आनंद विहार, दिल्ली
विशेष रूचि : व्यंग्य लेखन, हिन्दी व राजस्थानी में पद्य व गद्य दोनों विधा में लेखन, अब तक पंद्रह पुस्तकों का प्रकाशन, पांच अनुवाद हिंदी से राजस्थानी में प्रकाशित, राजस्थान साहित्य अकादमी (राजस्थान सरकार) द्वारा, पत्र पत्रिकाओं व समाचार पत्रों में नियमित प्रकाशन, राजस्थानी लोक गीतों के लिए प्रसिद्ध कंपनी “वीणा कैसेटस” के दो एलबमों में सात गीत संगीतबद्ध हुये हैं।
सम्मान : “राजस्थानी आगीवान” सम्मान से सम्मानित
श्री गंगानगर के सृजन साहित्य संस्थान का सृजन साहित्य सम्मान व
सरदारशहर गौरव (साहित्य) सम्मान व अनेक अन्य सम्मानरा
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
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