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क्या मिलता है मुफ्त में

राजेन्द्र लाहिरी
पामगढ़ (छत्तीसगढ़)
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ये हवा ये पानी,
ये धूप ये जंगल पहाड़,
नहीं कह सकते इसे मुफ्त का,
हर जीव हर इंसान को
ये प्रकृति की देन है,
इनके अनुसार रहो
ताउम्र सुख चैन है,
बिना पानी सींचे कलियां
भी नहीं खिलती,
मांगो तो भी फ्री में
गालियां भी नहीं मिलती,
शतरंज के प्यादे,
और नेताओं के वादे,
बिना लाभ के नहीं होते,
महीने भर का जगा,
फिर साल पांच रहते सोते,
ये चावल चना दे रहे
मुफ्त का कहते,
मगर हमारे करों के
हिस्से इसमें छुपे रहते,
शिक्षक बिना
पैसे नहीं पढ़ाता,
बिना पैसे आंतरिक
व्यवस्था नहीं चल पाता,
बिना वेतन मजदूर
मजदूरी को नहीं जाता,
बिना वेतन न्यायाधीश
न्याय नहीं दे पाता,
हर कर्म के पीछे
स्वार्थ छुपा होता है,
मजलूमों में भूख,
गरीबी, दर्द छुपा होता है,
सिर्फ बद्दुआ निःस्वार्थ
लोग करते हैं प्रयुक्त,
एक यही तो है जो
मिलता है बिल्कुल मुफ़्त।

परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी
निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

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