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उम्र का तकाज़ा

राजेन्द्र लाहिरी
पामगढ़ (छत्तीसगढ़)
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सफेद बालों को देखकर
अपनी पत्नी से कह दिया कि
अब तो तुम बूढ़ी हो रही हो,
अपने आज में खो रही हो,
उसने तपाक से कहा,
बुढ़ापे की निशानी
तुम पर भी बहुत भारी है,
बताओ क्या करने की तैयारी है?
मैंने हँसकर फिर धीमे से कहा,
चाह रहा हूँ बच्चे बड़े हो जाएं,
अपने पैरों पर खड़े हो जाएं,
पर ये बड़े होना क्यों नहीं चाह रहे?
समुद्र से भी गहरे जीवन को
क्यों नहीं थाह रहे?
बचपन की उस मासूम छांव में
न जाने क्या ढूंढ रहे हैं,
कागज़ की कश्तियों से अपनी
खुशियों को मूंद रहे हैं,
ज़िम्मेदारी के इस लंबे सफ़र से
शायद ये थोड़े अनजान हैं,
तभी तो खिलौनों की दुनिया में
इनके बसते अभी प्राण हैं,
चलो, वक़्त को
अपनी रफ़्तार चलने दें,
इनकी नादानियों को
कुछ दिन और पलने दें,
जब वक़्त का थपेड़ा आएगा,
यह समंदर इन्हें
खुद तैरना सिखाएगा।

परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी
निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

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