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खो रहे हैं

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
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हम एक ऐसी
दुनिया मे
खो गए हैं
जहां मृत्यू से
कोई भय नहीं है।
बचपन मे खोए
जवानी में खोए
ऐसे खोए की मनुष्य
बनना भूल गए।

एक दिन यूँ ही खोए हुए
हम ने एक सूखी काली
पड़ी टहनी को तोड़ा
उसकी पानी के प्यास की
फुसफुसाहट को
होठों से लगाया
लगा बारिश कहीं खो गई
इन फूल-पौधों को
सिसकता छोड़कर।

यूँ ही एकदिन हमने
सजने संवरने के
समान को छुआ,
जीवों की उधडती
चमड़ी की पीड़ा भरी
चीख को महसूस किया,
इस सजावट में कितने
जानवरों के शरीर कट कर
बलिदान हुए होंगे,
इन्सानियत भी खो गई
पशु-पक्षियों पर
अत्याचार करते-करते।

एक दिन मंदिर में ईश्वर की
मूर्ति को निहारते खो गए,
उनकी आंखों की नमी को
महसूस किया खुद की
आंखों के गीलेपन से,
मानो मूर्ति बोल रही हो,
तुम मेरे ही बनाए मनुष्य हो,
जिसने प्रेम खो दिया,
करुणा खो दी सारे
रिश्तों की मिठास खो दी,
अब तुम मुझे भी खो रहे हो…।

परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी
जन्म : २७ जुलाई १९६५ वाराणसी
शिक्षा : एम. ए., एम.फिल – समाजशास्त्र, पी.जी.डिप्लोमा (मानवाधिकार)
निवासी : लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा “जीवदया अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४” से सम्मानित
विशेष : साहित्यिक पुस्तकें पढ़ने के शौक ने लेखन की प्रेरणा दी और विगत ६-७ वर्षों से अपनी रचनाधर्मिता में संलग्न हैं।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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