
सुधीर श्रीवास्तव
बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश)
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कुण्डलिनी छंद
माया में हर जन फँसा, बना हुआ है हीन।
ठगनी उसको ठग रही, और संग में दीन।।
और संग में दीन, कौन लगता ठुकराया।
कहे मित्र यमराज, यही तो बंधन माया।।३१
लालच में इसके फँसे, हो पाते कब दूर।
ज्ञान, ध्यान, विज्ञान, सब होते मजबूर।।
सब होते मजबूर, द्वंद्व का भारी कच-कच।
माया के आधीन, स्वार्थ का होता लालच।।३२
जानें कब हम हो गये, माया के आधीन।
और आज अब हम सभी, बनकर घूमें दीन।।
बनकर घूमें दीन, आज हम खुद ही मानें।
आगे का अब हाल, हमारे ईश्वर जानें।।३३
मँहगाई की मार, रही रो जनता सारी।
सोच रही दिन रात, नई आई बीमारी।।
नई आई बीमारी, व्यर्थ कहना दुखदाई।
कहें मित्र यमराज, नया रिश्ता मँहगाई।।३४
मँहगाई का दौर है, बिकता नहीं अनाज।
हुई किसानी आजकल, बनी कोढ़ में खाज।।
बनी कोढ़ में खाज, व्यर्थ सब लगता भाई।
कहें मित्र यमराज, जान लेगी मँहगाई ।।३५
पावन गंगा नीर है, गाते हम गुणगान।
उससे ज्यादा है हमें, खुद पर अब अभिमान।।
खुद पर अब अभिमान, देखिए सब मनभावन।
कहें मित्र यमराज, मातु मम गंगा पावन।।३६
मँहगाई का दौर है, बिकता नहीं अनाज।
हुई किसानी आजकल, बनी कोढ़ में खाज।।
बनी कोढ़ में खाज, व्यर्थ सब लगता भाई।
कहें मित्र यमराज, जान लेगी मँहगाई ।।३७
अब तो जीवन से बड़ा, भारी हुआ दहेज।
हम सब अपनी बेटियाँ, पाते नहीं सहेज।।
कहें मित्र यमराज, ठाट से बैठो महतो।
लेना खूब दहेज, काम है केवल अब तो।।३८
पैसे का सब खेल है, लेना आप सहेज।
बड़े गर्व से कह रहा, मेरा नाम दहेज।।
मेरा नाम दहेज, दोष दूजे का कैसे।
हमको भी तो यार, सिर्फ दिखते हैं पैसे।।३९
अपने पर भी अब नहीं, रहा मुझे विश्वास।
केवल तुझसे है बची, मेरी अंतिम आस।।
कहें मित्र यमराज, देखते रहना सपने।
बड़े धैर्य के साथ, सोच कितने अब अपने।।४०
मानव जीवन कुछ नहीं, बस केवल अतिरेक।
पद पैसा पहचान का, करते सब अभिषेक।।
करते सब अभिषेक, काम इनका जस दानव।
कहें मित्र यमराज, आज ऐसा क्यों मानव।।४१
हमको इतना है पता, समय बड़ा बलवान।
पर कुंठित हम लोग हैं, पढ़ आये विज्ञान।।
पढ़ आये विज्ञान, आज बीमारी सबको।
इसका सफल इलाज, मित्र बतलाओ हमको।।४२
जमकर हिंसा कीजिए, छोड़ो व्यर्थ विचार।
यही आज का है बड़ा, मानो निज आधार।।
मानो निज आधार, छोड़ सब ये पहले कर।
नाचो-गाओ खूब, संग मस्ती कर जमकर।। ४३
परिचय :- सुधीर श्रीवास्तव
जन्मतिथि : ०१/०७/१९६९
शिक्षा : स्नातक, आई.टी.आई., पत्रकारिता प्रशिक्षण (पत्राचार)
पिता : स्व.श्री ज्ञानप्रकाश श्रीवास्तव
माता : स्व.विमला देवी
धर्मपत्नी : अंजू श्रीवास्तव
पुत्री : संस्कृति, गरिमा
संप्रति : निजी कार्य
विशेष : अधीक्षक (दैनिक कार्यक्रम) साहित्य संगम संस्थान असम इकाई।
रा.उपाध्यक्ष : साहित्यिक आस्था मंच्, रा.मीडिया प्रभारी-हिंददेश परिवार
सलाहकार : हिंंददेश पत्रिका (पा.)
संयोजक : हिंददेश परिवार(एनजीओ) -हिंददेश लाइव -हिंददेश रक्तमंडली
संरक्षक : लफ्जों का कमाल (व्हाट्सएप पटल)
निवास : गोण्डा (उ.प्र.)
साहित्यिक गतिविधियाँ : १९८५ से विभिन्न विधाओं की रचनाएं कहानियां, लघुकथाएं, हाइकू, कविताएं, लेख, परिचर्चा, पुस्तक समीक्षा आदि १५० से अधिक स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर की पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित। दो दर्जन से अधिक कहानी, कविता, लघुकथा संकलनों में रचनाओं का प्रकाशन, कुछेक प्रकाश्य। अनेक पत्र पत्रिकाओं, काव्य संकलनों, ई-बुक काव्य संकलनों व पत्र पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल्स, ब्लॉगस, बेवसाइटस में रचनाओं का प्रकाशन जारी।अब तक ७५० से अधिक रचनाओं का प्रकाशन, सतत जारी। अनेक पटलों पर काव्य पाठ अनवरत जारी।
सम्मान : विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं द्वारा ४५० से अधिक सम्मान पत्र। विभिन्न पटलों की काव्य गोष्ठियों में अध्यक्षता करने का अवसर भी मिला। साहित्य संगम संस्थान द्वारा ‘संगम शिरोमणि’सम्मान, जैन (संभाव्य) विश्वविद्यालय बेंगलुरु द्वारा बेवनार हेतु सम्मान पत्र।
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