
श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
लखनऊ (उ.प्र.)
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कभी कभी पूजी जाती हूँ,
पर्व त्यौहारों में सजाई जाती हूँ।
इधर उधर बेमन से घुमाई जाती हूँ,
लोग मनोरंजन का साधन समझते है,
शांत चित्त मैं सब कुछ करती जाती हूँ।मेरे भी अहसास हैं,
सुख के, दुख दर्द के
मेरा भी परिवार बसता है।
इन सुन्दर कल कल करती नदियों के किनारे
हरियाली से भरा मेरा घर जो बहुत सुन्दर था,
अब वो उजड़ने लगा है ।
मेरा तो किसी से बैर नहीं
फिर भी हम ना जाने क्यों सताये जाते हैं?
आज मैं तड़प रही हूँ, मेरा परिवार भी दुखी है।
कभी भूख , कभी बेइंतहा दर्द की मार से
कभी मानव के राक्षसी अत्याचार से।इन सबकी अनदेखी से ही
मेरे वंशजों की मौत हो रही है।
मेरे बच्चे को ‘मेरी कोख में ही’ मार दिया।
दर्द से छटपटाती,कराहती, चीत्कारती
भटक रही हूँ इधर उधर मैं।कहाँ हैं वो लोग जो मेरी पूजा करते थे?
कहाँ हैं वे सम्वेदनायें?
जो इंसान को इंसान बनाती है।
आखिर मेरा क्या कुसूर था?
मुझे इतनी बेदर्दी से क्यों मारा गया
क्या यही दोष है कि
मैं एक मूक हथिनी हूँ?
दुनिया कैसे भूल गयी
मैं भी तो माँ हूँ??
परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी
जन्म : २७ जुलाई १९६५ वाराणसी
शिक्षा : एम. ए.,एम.फिल – समाजशास्त्र,पी.जी.डिप्लोमा (मानवाधिकार)
निवासी : लखनऊ (उ.प्र.)
विशेष : साहित्यिक पुस्तकें पढ़ने के शौक ने लेखन की प्रेरणा दी और विगत ६-७ वर्षों से अपनी रचनाधर्मिता में संलग्न हैं।
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