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हाँ मैं भी अब लिखने लगी

रश्मि श्रीवास्तव “सुकून”
पदमनाभपुर दुर्ग (छत्तीसगढ़)

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मैं गुमसुम सी धीर गंभीर सी
उन्मुक्त होकर खुलने लगी
मुख्यधारा से अब जुडने लगी
हाँ मैं भी अब लिखने लगी।
कहीं डर और शंका मन में लिए
कहीं हीन भावना से जकड़े हुए
खुद को बेहतरीन कहने लगी
हाँ मैं भी अब लिखने लगी।
जिंदगी के कुछ पहलू थे अनछूए
कुछ सवाल ऐसे थे अनसुलझे
उन सवालों में ही हल ढूँढने लगी
हाँ मैं भी अब लिखने लगी।
दर्द ऐसा किसी से कहा ना गया
कहीं चुप रह गई कहीं कराया गया
अब हाल-ए-दिल अपना कहने लगी
हाँ मैं भी अब लिखने लगी।
जंजीरों ने पाँव जकड़ रखे थे
हर कदम पर सवाल खड़े कर रखे थे
अब कदम दर कदम मैं बढ़ने लगी
हाँ मैं भी अब लिखने लगी।
कभी दौर ऐसा भी आया था
जहां खुद को मैंने अकेला पाया था
अब हौसलों के कारवां बनाने लगी
हाँ मैं भी अब लिखने लगी।
बिना गलतियों के सज़ा पायी है
जमानत मुझे रब ने दिलाई है
अब इंसाफ के लिये लड़ने लगी
हाँ मैं भी अब लिखने लगी ।
चलो कुछ ऐसा करते हैं “सुकून“
लोग देखते रहें, ऐसा हो जुनून
मंजिलों पर फतह अब करने लगी
हाँ मैं भी अब लिखने लगी।

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परिचय : रश्मि श्रीवास्तव “सुकून”
निवासी : मुक्तनगर, पदमनाभपुर दुर्ग (छत्तीसगढ़)
घोषणा : मैं यह शपथ पूर्वक घोषणा करती हूँ कि उपरोक्त रचना पूर्णतः मौलिक है।


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