
मनीष कुमार सिहारे
बालोद, (छत्तीसगढ़)
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प्रगटा जब यहां तो सारा,
कायनात शून्य था।
नेत्रों से दृश्य सब,
मैं दृश्यों के तुल्य था।।
नीकल जूंबा से चीख मेरे,
कानो में धुन्न था।
रंगीन कायनात भी,
रंगों से अपुर्ण था।।
मेरे पुर्व यहां सभी,
नामों से भी बेनाम था।
मै खड़ा था जहां,
वो जगह भी अनजान था।।
इस जग से वाकिफ क्या,
मैं खुद से अनजान हूं।।
मन मे ये सवाल है,
की कौन हूं मैं कौन हूं।
मन में ये सवाल है,
की कौन हूं मैं कौन हूं।कण कण से बना मैं,
ना आदि का संयोग हूं।
हूं ना काव्य रस मैं,
पर रस से परिपूर्ण हूं।।
मुझी से ये जमाना है,
जमाने से मैं ना हूं।
मन में ये सवाल है,
की कौन हूं मैं कौन हूं।
कर्म मार -काट का,
तो मैं एक क्षत्रिय हूं।
वो ही ज्ञान बांट का,
तो मैं एक ज्ञानिय हूं।।
कर्मों से जानू मैं ,
ऐसा ना कर्मजान हूं।
मुझी से सब बने यहां,
मैं इनका ना संतान हूं।।
मन में ये सवाल है,
की कौन हूं मैं कौन हूं।
मन में ये सवाल है,
की कौन हूं मैं कौन हूं।गीता-ये-जुबान पर,
तो हिंदुओं का मान हूं।
अगर जुंबा कुरान हो,
तो मुस्लिम मुसलमान हूं।।
निकला जो कण्ठ से,
क्या वो शब्द से मैं जान हूं।
जातियां अनेक है,
क्या वो जाति से मैं जान हूं।।
ज्ञानवान होके भी,
इस बात से अनजान हूं।
जाति धर्म का पिता,
या उसमे पला मैं हूं।।
मन में ये सवाल हैं,
की कौन हूं मैं कौन हूं।
मन में ये सवाल है,
की कौन हूं मैं कौन हूं।
परिचय :- मनीष कुमार सिहारे
पिता : श्री झग्गर सिंह
निवासी : पटेली, जिला बालोद, (छत्तीसगढ़)
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